अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को H-1B वीजा को लेकर एक बड़ा झटका लगा है। बोस्टन की 1st सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने लोअर कोर्ट के जज के 8 जून के फैसले पर रोक लगाने से मना कर दिया।
तीन जजों की बेंच ने कहा कि ट्रंप प्रशासन यह साबित करने में नाकाम रहा कि उसने फीस लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं किया था। यानी 100,000 डॉलर की फीस बढ़ोतरी पर रोक जारी रहेगी।
ट्रंप ने बढ़ा दी थी फीस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में एक आदेश जारी करके H-1B वीजा पर फीस बढ़ाकर 100,000 डॉलर कर दी थी। इससे पहले यह फीस केवल 2,000 से 5,000 अमेरिकी डॉलर थी।
अमेरिकी टेक कंपनियां विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए ज्यादातर इसी वीजा पर निर्भर रहती हैं। इस फैसले का भारतीयों पर सबसे बड़ा असर पड़ा था, जो अमेरिकी टेक इंडस्ट्री की वर्क फोर्स का एक अहम हिस्सा हैं।
80% H-1B वीजा धारक भारतीय
रिपोर्टों के अनुसार, H-1B वीजा हासिल करने वालों में लगभग 80 प्रतिशत भारतीय हैं। यानी यह फैसला सीधे तौर पर लाखों भारतीय प्रोफेशनल्स को प्रभावित करता था।
इस फीस बढ़ोतरी का मतलब था कि अमेरिका में नौकरी करने वाले भारतीयों को अपने वीजा के लिए भारी राशि चुकानी पड़ती, जिससे कंपनियों का खर्च भी बढ़ जाता।
H-1B प्रोग्राम के गलत इस्तेमाल का आरोप
H-1B प्रोग्राम के तहत अमेरिका हर साल 65,000 वीजा जारी करती है। इसके अलावा एडवांस्ड डिग्री वाले वर्कर्स के लिए 20,000 वीजा और दिए जाते हैं। यह तीन से छह साल के लिए होते हैं।
ट्रंप ने फीस में भारी बढ़ोतरी के पीछे तर्क दिया था कि H-1B वीजा का गलत इस्तेमाल हो रहा है, ताकि अमेरिकी वर्कर्स की जगह कम वेतन और कम स्किल वाले वर्कर्स को रखा जा सके।
अब आगे क्या?
अपील कोर्ट के इस फैसले के बाद अब H-1B वीजा पर 100,000 डॉलर फीस पर रोक जारी रहेगी। इससे भारतीय प्रोफेशनल्स और अमेरिकी टेक कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।
ट्रंप प्रशासन के पास अब सुप्रीम कोर्ट में जाने का विकल्प है, लेकिन फिलहाल यह फैसला भारतीयों के पक्ष में गया है।