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बिजनेस

सॉरी, AI को लेकर मैं गलत था… 2.5 लाख नौकरियां जाने के बाद आया होश, ये कैसा खेल?

SMW NEWS BUREAU
Last updated: 29/05/2026 11:08 PM
By SMW NEWS BUREAU 8 Min Read
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AI आएगा और सबकुछ बदल जाएगा। सिलिकॉन वैली के जिन सूरमाओं ने कल तक छाती ठोककर दावा किया था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंसानी वजूद को निगल जाएगा, उनके सुर आज अचानक बदल गए हैं। जो सैम ऑल्टमैन और डारियो अमोदेई कल तक पॉडकास्ट्स पर बैठकर डरा रहे थे कि ‘भैया, बोरिया-बिस्तर समेट लो, AI आ रहा है और तुम्हारी नौकरियां खा रहा है’, अब यही लोग बड़ी मासूमियत से कह रहे हैं, ‘सॉरी, हमसे कैलकुलेशन में थोड़ी चूक हो गई।’

Contents
ढाई लाख से अधिक लोग नौकरी गंवा चुके हैंकिन कंपनियों में हुई तगड़ी छंटनी?अब अचानक क्यों पिघले हैं टेक दिग्गजों के दिल?धंधे का गणित क्या है?शेयरों का खेल भी है?एनवीडिया के सीईओ ने सीधे CEOs पर साधा निशानाAI के भरोसे कितना काम छोड़ा जा सकता है?क्या है असली सबक?

लेकिन इस ‘सॉरी’ और ‘यू-टर्न’ के बीच का जो सच है, वह बेहद डरावना और कड़वा है। जब ये बड़े-बड़े टेक गुरु AI की हाइप का गुब्बारा फुला रहे थे, तब दुनिया भर के कॉर्पोरेट मालिकों को लगा कि यही सही मौका है। उन्होंने बिना सोचे-समझे ताबड़तोड़ छंटनी शुरू कर दी। नतीजा दुनिया के सामने है।

ढाई लाख से अधिक लोग नौकरी गंवा चुके हैं

पिछले करीब दो वर्षों से नौकरी छीनने का एक अलग ही खेल चल रहा था। अचानक कह दिया जा रहा था कि कल से आपको दफ्तर आने की जरूरत नहीं है, आप जो काम कर रहे थे, वह AI की मदद से हो जाएगा। सोचिए उस शख्स पर क्या बीतती होगी, जिसके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी है, और महज एक दिन में वह बेरोजगार हो गया।

आंकड़े हर नौकरीपेशा को डराते हैं। सिर्फ साल 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही करीब सवा लाख लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं। साल 2025 में भी कम से कम 1.25 लाख लोग नौकरी से हाथ धो बैठे थे। यानी AI का खौफ दिखाकर बड़े-बड़े CEOs ने कुल मिलाकर ढाई लाख से अधिक इंसानों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया।

किन कंपनियों में हुई तगड़ी छंटनी?

मेटा, अमेजन, गूगल और स्नैप जैसी तमाम दिग्गज कंपनियों ने तगड़ी छंटनी कर डाली। इसका सीधा कारण AI को लेकर बदलाव बताया गया। जीते-जागते इंसानों को कंप्यूटर कोड्स के भरोसे सड़क पर छोड़ दिया गया।

डर का यह माहौल इस कदर हावी था कि शुरुआती स्तर की कोडिंग, कंटेंट राइटिंग, कस्टमर सपोर्ट और डेटा एनालिसिस से जुड़े युवाओं का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। जब नौकरी ही नहीं मिलेगी, तो फिर उससे जुड़े कोर्स करना बेकार हो जाएगा। यहां AI की चोट एजुकेशन सिस्टम तक जा पहुंची।

अब अचानक क्यों पिघले हैं टेक दिग्गजों के दिल?

लेकिन, अब अचानक इन टेक दिग्गजों का दिल क्यों पिघल रहा है? क्या इन्हें उन ढाई लाख परिवारों का दर्द समझ आ गया? यू-टर्न लेते हुए OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन को सिडनी के एक बैंकिंग सम्मेलन में यह कहना पड़ा कि मैं गलत साबित होने पर खुश हूं, मुझे लगा था व्हाइट-कॉलर नौकरियां अब तक खत्म हो जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कल तक यही लोग कह रहे थे कि AI की वजह से सबसे पहले व्हाइट-कॉलर नौकरियां खत्म होंगी। आज उनके सुर पूरी तरह बदल चुके हैं।

धंधे का गणित क्या है?

अब कंपनियों को समझ आ रहा है कि जिस AI को वे इंसानों का रिप्लेसमेंट मान रहे थे, उसे पालना-पोसना और मेंटेन करना बहुत महंगा सौदा साबित होने वाला है। कई मामलों में तो AI सिस्टम का बिजली और सर्वर का खर्च, एक आम कर्मचारी की सैलरी से भी ज्यादा हो जाता है। जिस मुनाफे के चक्कर में इंसानों को निकाला गया, वह गणित अब दम तोड़ता दिख रहा है।

बड़े AI मॉडल्स को चलाने के लिए हैवी कंप्यूटिंग पावर, महंगे ग्राफिक्स कार्ड्स (GPUs) और निरंतर बिजली की जरूरत होती है। डेटा सेंटर्स का खर्च इतना बढ़ गया कि कई मामलों में AI सिस्टम को मेंटेन करने की लागत, एक इंसानी कर्मचारी की सैलरी से भी काफी अधिक बैठ रही है।

शेयरों का खेल भी है?

एक और पहलू यह भी है कि अब इन कंपनियों के बड़े-बड़े IPOs बाजार में आने वाले हैं। अगर बाजार में सिर्फ डर का माहौल रहेगा, तो निवेशक पैसा नहीं लगाएंगे। इसलिए पहले डर बेचकर AI के सॉफ्टवेयर बेचे गए, और अब उम्मीद बेचकर शेयर बेचने की तैयारी है। यानी पूरा खेल पैसे का है, इंसानों की नौकरियों का नहीं।

एनवीडिया के सीईओ ने सीधे CEOs पर साधा निशाना

इस बीच दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एनवीडिया के सीईओ जेंसन हुआंग का हालिया बयान भी टेक दिग्गजों के फैसलों पर तमाचा है। उन्होंने छंटनी के लिए सीधे तौर पर CEOs को जिम्मेदार ठहराया। उनका दावा है कि AI नौकरियां बिल्कुल नहीं खाएगा, बल्कि भविष्य में और नए मौके पैदा करेगा।

हुआंग ने साफ शब्दों में कहा कि जो CEOs नौकरियों में कटौती के लिए AI को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वे ‘आलसी’ हैं और उनके तर्क में दम नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह के बहानों से हम आम लोगों को डरा रहे हैं, जो पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना है।

जेंसन हुआंग ने कहा, ‘AI तकनीक तो अभी-अभी आई है, यह कैसे संभव है कि कंपनियां इसकी वजह से पहले ही नौकरियां खत्म कर रही हैं? जो AI तकनीक पिछले छह महीने से काम के लायक है, उसके नाम पर कंपनियां दो साल पहले से लोगों को निकाल रही हैं। यह बात पूरी तरह से तर्कहीन है।’ उन्होंने यह भी बताया कि AI की वजह से रोजगार बढ़ रहे हैं और उनकी कंपनी एनवीडिया में लगातार नई भर्तियां चल रही हैं।

AI के भरोसे कितना काम छोड़ा जा सकता है?

अभी तक के प्रयोगों से सामने आया है कि AI अक्सर हैलुसिनेशन यानी गलत या काल्पनिक डेटा उपलब्ध करा देता है। इसलिए खासकर बिजनेस डेटा, कानूनी मामलों या वित्तीय विश्लेषण में AI के भरोसे शत-प्रतिशत काम नहीं छोड़ा जा सकता है। कंपनियों को समझ में आ गया है कि AI के काम को री-चेक करने के लिए भी अंततः एक अनुभवी इंसान की ही जरूरत है।

खुद सैम ऑल्टमैन ने स्वीकार किया है कि बैंकिंग, सलाहकारी और रचनात्मक क्षेत्रों में ग्राहक अभी भी इंसानों से बात करना और उनके अनुभवों पर भरोसा करना पसंद करते हैं। AI भले ही कुशल हो, लेकिन उसमें इंसानी संवेदनाओं और अनुभवों की कमी है।

क्या है असली सबक?

पिछले करीब एक साल में AI को लेकर जो कुछ हुआ है, वह इस बात का गवाह है कि टेक्नोलॉजी चाहे कितनी भी एडवांस हो जाए, वह इंसान का 100 प्रतिशत विकल्प नहीं बन सकती। तकनीक हमेशा इंसानों की मदद के लिए होनी चाहिए, न कि उनके वजूद को मिटाने के लिए।

आज जो यू-टर्न आया है, उसने यह साबित कर दिया है कि बाजार चाहे कितना भी डिजिटल हो जाए, दुनिया ‘इंसानी दिमाग और संवेदना’ के बिना नहीं चल सकती। लेकिन तब तक लाखों लोग अपनी नौकरियां गंवा चुके हैं, जिनका भविष्य अधर में लटक गया है। अब देखना यह होगा कि क्या कंपनियां अपनी गलती मानकर दोबारा लोगों को वापस बुलाएंगी, या फिर यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।

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