पहले भारत के अमीर लोग अपना पैसा सिर्फ देश के अंदर ही बिजनेस, जमीन-जायदाद और शेयर बाजार जैसी जगहों पर लगाते थे। लेकिन अब, देश के सबसे अमीर परिवारों और बड़े बिजनेसमैन की पसंद बदल रही है।
वे अब चुपचाप एक नई चीज़ में निवेश कर रहे हैं – विदेशों में दूसरी रेजिडेंसी या वहां की नागरिकता लेना। यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों में काफी तेजी से हुआ है।
क्या है इसका मकसद?
इसका मकसद लाज़मी तौर पर भारत छोड़ना नहीं है। इसके बजाय, अमीर परिवार तेजी से एक प्लान बी खरीद रहे हैं जो उन्हें वैश्विक गतिशीलता, उनके बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक अवसर और अंतरराष्ट्रीय बिजनेस हब तक पहुंच प्रदान करता है।
यह एक तरह का इंश्योरेंस है। वे भारत छोड़कर नहीं जा रहे हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनके पास ऐसा करने का विकल्प हो।
पिछले पांच सालों में बदली तस्वीर
Garant In के संस्थापक और ग्लोबल सीईओ एंड्री बोइको के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में इस बदलाव में काफी तेजी आई है। अब यह कोई नया आइडिया नहीं बल्कि एक आम रणनीति बन गई है।
बाजार के ज्यादातर संकेत बताते हैं कि इस दौरान इसमें गहरी दिलचस्पी लेने वालों और वास्तव में आवेदन करने वालों की संख्या कम से कम दोगुनी हो गई है।
‘विकल्पों में निवेश’
बोइको कहते हैं, “पिछले पांच सालों में भारतीय हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs), प्रमोटरों और फैमिली ऑफिसों के बीच दूसरी रेजिडेंसी की मांग एक नए आइडिया से बदलकर एक बहुत ही आम रणनीति बन चुकी है।”
आज के भारतीय HNIs सिर्फ एक रेजिडेंसी नहीं खरीद रहे हैं। वे ‘विकल्पों’ में निवेश कर रहे हैं। इन प्रोग्राम्स को भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है।
लाइफस्टाइल से रिस्क मैनेजमेंट तक
एक दशक पहले, लंदन, दुबई या सिंगापुर में किसी विदेशी प्रॉपर्टी का होना सिर्फ एक स्टेटस सिंबल था। यह लाइफस्टाइल से जुड़ी एक खरीदारी थी।
लेकिन पिछले कुछ सालों ने इस सोच को बदल कर रख दिया है। युद्ध, प्रतिबंध, अचानक टैक्स में होने वाले बदलाव और सख्त वीजा नियमों ने वैश्विक गतिशीलता को इतना नाजुक बना दिया है, जितना यह पहले कभी महसूस नहीं हुई थी।
एक भारतीय कितनी रेजिडेंसी रख सकता है?
यह कॉन्सेप्ट बहुत सीधा है। एक भारतीय नागरिक दोहरी नागरिकता नहीं रख सकता, लेकिन वह विदेशों की कई रेजिडेंसी जरूर रख सकता है।
इसका मतलब है कि परिवार अपना भारतीय पासपोर्ट भी अपने पास रखता है और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश में रहने, पढ़ाई करने या बिजनेस करने का कानूनी अधिकार भी हासिल कर लेता है।
भारत के अमीर कहां जा रहे हैं?
भारतीय अमीरों को आकर्षित करने वाले देश अब बदल चुके हैं। जहां पहले की पीढ़ियां अक्सर EB-5 जैसे रास्तों से अमेरिका की तरफ देखती थीं, वहीं आज के अमीर परिवार यूएई, पुर्तगाल, ग्रीस, इटली, माल्टा और कुछ कैरेबियाई देशों में निवेश कर रहे हैं।
अपने बेहतरीन बिजनेस इकोसिस्टम, भारत से नजदीकी और अनुकूल टैक्स माहौल के कारण यूएई आज भी सबसे पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है।
कितना खर्च कर रहे हैं?
यूरोप में एंट्री चाहने वाले निवेशकों को पुर्तगाल आकर्षित कर रहा है, जहां कई लोग रेगुलेटेड इन्वेस्टमेंट फंड्स के जरिए 2.5 करोड़ से 5 करोड़ रुपये के बीच निवेश कर रहे हैं।
ग्रीस भी एक मजबूत यूरोपीय विकल्प के रूप में उभरा है, जहां निवेश की सीमा 2.5 करोड़ रुपये से लेकर लगभग 8 करोड़ रुपये तक है। इटली कम लागत वाले ‘स्टार्टअप इन्वेस्टमेंट रूट’ के जरिए निवेशकों को आकर्षित कर रहा है।
रियल एस्टेट से हटकर नए रास्ते
पुराना मॉडल बहुत सीधा था – विदेश में एक अपार्टमेंट खरीदो, रेजिडेंसी परमिट पाओ और काम खत्म। लेकिन अब वह मॉडल पूरी तरह खत्म हो चुका है।
कई देशों ने रियल एस्टेट पर आधारित अपने ‘गोल्डन वीजा’ रास्तों को कड़ा कर दिया है या बंद कर दिया है। इसने निवेशकों को रेगुलेटेड फंड्स, सरकारी बॉन्ड, स्टार्टअप निवेश और बिजनेस से जुड़े रास्तों की तरफ बढ़ने पर मजबूर किया है।
दोहरी रणनीति अपना रहे परिवार
आजकल एक आम तरीका यह अपनाया जा रहा है कि बैंकिंग और बिजनेस की जरूरतों के लिए यूएई जैसी जगह पर एक मुख्य रेजिडेंसी सुरक्षित कर ली जाती है।
साथ ही, अगली पीढ़ी की पढ़ाई और ग्लोबल मोबिलिटी के लिए लॉन्ग-टर्म बैकअप के तौर पर किसी फंड निवेश के जरिए यूरोप की रेजिडेंसी भी जोड़ ली जाती है। यह एक बहु-स्तरीय रणनीति है।
‘यह भारत छोड़ने के बारे में नहीं है’
विशेषज्ञों का कहना है कि यह देश छोड़ने के बारे में नहीं है। यह एक तरह का इंश्योरेंस है, ताकि अगर कोई संकट आता है या नीतियां रातों-रात बदल जाती हैं, तो अमीरों के पास विकल्प मौजूद हों।
बोइको कहते हैं, “अगर कोई संकट आता है या नीतियां रातों-रात बदल जाती हैं, तो आप विकल्पों के लिए हाथ-पैर मारना नहीं चाहेंगे। आप चाहेंगे कि रेजिडेंसी कार्ड पहले से ही आपके हाथ में हो।”
ग्लोबल मोबिलिटी की बढ़ती जरूरत
आज की दुनिया में अमीर परिवारों के लिए ग्लोबल मोबिलिटी बहुत जरूरी हो गई है। वैश्विक स्तर पर व्यापार करने वाले लोगों को एक देश से दूसरे देश जाना पड़ता है।
विदेशी रेजिडेंसी होने से वीजा की परेशानी नहीं होती। यह एक बिजनेस और व्यक्तिगत जीवन दोनों के लिए फायदेमंद है।
अगली पीढ़ी के लिए बेहतर अवसर
अमीर परिवार अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाना चाहते हैं। विदेशी रेजिडेंसी होने से उन्हें अच्छे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में एडमिशन लेने में आसानी होती है।
बोइको के अनुसार, पिछले पांच सालों में इस बदलाव में काफी तेजी आई है। यह खबर सुर्खियों में नहीं आती, लेकिन बहुत खामोशी से लगातार एक बातचीत का दौर चल रहा है।