नई दिल्ली | भारत अपनी ऊर्जा निर्भरता को कम करने के लिए एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू कर रहा है। सरकार ने ‘समुद्र मंथन’ नामक राष्ट्रीय अपतटीय खोज योजना के तहत 84,084 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी है। इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र (deep-sea) में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को बढ़ावा देना है, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत अपने कच्चे तेल का 88-89% और प्राकृतिक गैस का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है।
क्यों ज़रूरी है ‘समुद्र मंथन’?
भारत में कई अपतटीय (offshore) क्षेत्र हैं, जिनमें तेल और गैस के बड़े भंडार हो सकते हैं, लेकिन ये अभी तक बड़े पैमाने पर अनछुए हैं। इन जगहों से तेल निकालना कठिन और महंगा है, जिसके कारण निजी कंपनियां इसमें निवेश करने से हिचकिचाती हैं। इस योजना के तहत, सरकार सर्वे, भूवैज्ञानिक अध्ययन, ड्रिलिंग और बुनियादी ढांचे जैसे प्रारंभिक कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराएगी। इसका उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाला डेटा तैयार करना है, जो संसाधनों की पहचान करने और निवेश आकर्षित करने में मदद करेगा।
योजना के तहत क्या होगा?
‘समुद्र मंथन’ के तहत निम्नलिखित कार्य किए जाएंगे:
- आधुनिक तकनीक से संभावित क्षेत्रों की पहचान।
- आशाजनक गहरे और अति-गहरे पानी के क्षेत्रों में ड्रिलिंग।
- सीमावर्ती क्षेत्रों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग और सामान्य उत्पादन।
- तेल-गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्र, आधुनिक डिजिटल प्रबंधन और क्षमता निर्माण।
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इसके क्या लाभ होंगे?
सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से समय के साथ भारत के तेल और गैस भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल के बराबर मात्रा जुड़ जाएगी। हालांकि, व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में कई साल लग सकते हैं, लेकिन सफल खोजों से भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता कम होगी, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, निवेश और रोजगार बढ़ेंगे और देश की समग्र ऊर्जा क्षमता को बल मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस आधुनिक ‘समुद्र मंथन’ का उल्लेख किया था, और अब यह योजना उस दृष्टि को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।