नई दिल्ली | 79वें स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक लाल किले (Red Fort) की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा – ‘दिमागी नक्सल’ (Dimagi Naxal)। पीएम मोदी ने कहा कि जहाँ एक ओर जंगलों में सशस्त्र नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, वहीं अब शहरों, शिक्षण संस्थानों और बौद्धिक मंचों पर ‘दिमागी नक्सल’ सक्रिय हैं, जो अपनी विचारधारा से समाज में अराजकता और भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने देशवासियों से ऐसे तत्वों को पहचानने और अलग-थलग करने की अपील की।
क्या कहा PM Modi ने?
प्रधानमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद ने चार दशकों तक देश की बड़ी आबादी को बंदूक की नोक पर रखा और 3,500 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को शहीद कर दिया। लेकिन अब सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई और विकास कार्यों के कारण सशस्त्र नक्सलवाद काफी हद तक समाप्त हो चुका है। उन्होंने कहा, “जंगल से नक्सली खत्म हो गए हैं, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ मौके की तलाश में हैं।”
पीएम मोदी ने आगाह किया कि ये ‘दिमागी नक्सली’ सीधे हथियार नहीं उठाते, बल्कि अपने विचारों और भाषा के जरिए देश में तनाव, असंतोष और विभाजन फैलाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि बरसों तक माओवादी सोच रखने वाले लोग सत्ता के गलियारों और सरकारी समितियों में सलाहकार बनकर बैठे रहे और राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करते रहे।
क्या है ‘Dimagi Naxal’?
पीएम मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया, जो:
- हिंसा और अराजकता के रास्ते खोदते हैं।
- समाज को जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बांटने की कोशिश करते हैं।
- विकसित भारत के रास्ते में बाधा डालते हैं।
- झूठे मुखौटे पहनकर देश को कमजोर करने वाले विचारों को बढ़ावा देते हैं।
क्या है पृष्ठभूमि?
पीएम मोदी ने पहले भी ‘अर्बन नक्सल’ (Urban Naxal) शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसे अक्सर कांग्रेस और कुछ बुद्धिजीवी वर्ग से जोड़कर देखा जाता था। अब ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के जरिए उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर उस विचारधारा को निशाना बनाया है, जो शहरी और बौद्धिक स्तर पर देश को अस्थिर करने की कोशिश करती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे ऐसे बहकावे से बचें और विकसित भारत के संकल्प के साथ जुड़ें।