देशभर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में भक्तों द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान और आभूषणों की गिनती तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं लागू हैं।
उज्जैन के महाकाल मंदिर, उत्तर प्रदेश के विंध्याचल मंदिर और महाराष्ट्र के शिरडी साईबाबा मंदिर में दान राशि की गणना सीसीटीवी निगरानी, प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षा व्यवस्था के बीच की जाती है।
महाकाल मंदिर: 24 घंटे CCTV निगरानी
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ दान में भी लगातार इजाफा हो रहा है। मंदिर समिति के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2025-26 में मंदिर की कुल आय लगभग 142 करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है, जिसमें सिर्फ दान से करीब 80 करोड़ रुपये मिले हैं।
महाकाल लोक बनने के बाद यहां श्रद्धालुओं की संख्या में बड़ा उछाल आया है। मंदिर प्रशासन के अनुसार दान पेटियों से 62 करोड़ रुपये, नगद काउंटर से 5.5 करोड़ रुपये, ऑनलाइन माध्यम से 3.60 करोड़ रुपये और गुप्त दान के रूप में 4.65 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
प्रसाद बिक्री से भी बंपर कमाई
इसके अलावा लड्डू प्रसाद बिक्री से भी करीब 65 करोड़ रुपये की आय दर्ज की गई है। यानी महाकाल मंदिर की कुल आय में दान और प्रसाद दोनों का बड़ा योगदान है।
मंदिर समिति के सहायक प्रशासक आशीष फलवाड़िया के अनुसार दान पेटियां 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी में रहती हैं।
पारदर्शी गणना और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
दान गणना पारदर्शी कक्ष में अधिकारियों की मौजूदगी में होती है। सुरक्षा के लिहाज से कर्मचारियों की जेबें तक सिल दी जाती हैं, ताकि किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो।
मंदिर परिसर में ऑनलाइन दान के लिए कई जगह क्यूआर कोड भी लगाए गए हैं। विदेशों से आने वाले श्रद्धालु विदेशी मुद्रा और सोने-चांदी के आभूषण भी दान करते हैं, जिनकी समय-समय पर गणना और रिकॉर्डिंग की जाती है।
विंध्याचल मंदिर: दान व्यवस्था पर सवाल
वहीं उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर में दान व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। श्री विंध्य पंडा समाज के पूर्व अध्यक्ष राजन पाठक ने आरोप लगाया है कि दान में मिलने वाले सोने-चांदी के आभूषणों की सही जांच और पारदर्शी रिकॉर्डिंग नहीं की जाती।
उनका कहना है कि आभूषणों को केवल ‘पीली धातु’ और ‘सफेद धातु’ के रूप में दर्ज कर लॉकर में रख दिया जाता है, जबकि उनका वास्तविक वजन और मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया जाता।
दान राशि के उपयोग को लेकर भी सवाल
राजन पाठक ने यह भी आरोप लगाया कि वर्षों से स्टॉक बुक व्यवस्था लागू नहीं की गई और दान राशि के उपयोग का पूरा हिसाब सार्वजनिक नहीं किया जाता।
विंध्य विकास परिषद के अनुसार विंध्याचल, कालीखोह और अष्टभुजा मंदिरों में कुल 22 दान पात्र लगाए गए हैं। दान राशि की गणना हर तीन-चार महीने में मजिस्ट्रेट की निगरानी और सीसीटीवी कैमरों के बीच की जाती है।
प्रशासन का दावा- कोई शिकायत नहीं
परिषद के सचिव और सिटी मजिस्ट्रेट अविनाश कुमार का कहना है कि दान में मिलने वाले सोने-चांदी के आभूषण बहुत अधिक नहीं होते और उन्हें डबल लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है।
उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल में दान को लेकर कोई शिकायत सामने नहीं आई है। हालांकि, राजन पाठक के आरोपों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिरडी साईबाबा मंदिर: पारदर्शिता का मॉडल
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शिरडी साईबाबा मंदिर में भी हर साल करोड़ों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। ट्रस्ट के अनुसार मंदिर की हुंडी में सालाना करीब 65 करोड़ रुपये का चढ़ावा आता है।
यहां दान की गिनती सप्ताह में दो बार, मंगलवार और शुक्रवार को विशेष काउंटिंग हॉल में की जाती है।
कड़ी सुरक्षा और निगरानी
यह पूरा क्षेत्र सीसीटीवी निगरानी में रहता है और गिनती के दौरान बैंक अधिकारियों, चैरिटी कमिश्नर के प्रतिनिधियों और सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी रहती है।
शिरडी साईबाबा संस्थान ट्रस्ट के सीईओ गोरक्ष गाड़िलकर ने दावा किया कि दान में एक रुपये का भी हेरफेर नहीं होता। उन्होंने बताया कि गिनती के बाद रकम तुरंत राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा कर दी जाती है।
550 KG सोना और 7030 KG चांदी
ट्रस्ट के पास करीब 550 किलो सोना और 7030 किलो चांदी सुरक्षित रखी गई है। यह एक बहुत बड़ा आंकड़ा है।
सोने-चांदी के आभूषणों का मूल्यांकन अधिकृत गोल्ड वैल्यूअर द्वारा किया जाता है और हर रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से संरक्षित रखा जाता है। ट्रस्ट प्रशासन का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के साथ संचालित की जाती है।
अलग-अलग मॉडल, एक ही चुनौती
तीनों धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाएं यह दिखाती हैं कि देश के बड़े मंदिरों में दान राशि और आभूषणों की सुरक्षा तथा गणना को लेकर अलग-अलग मॉडल अपनाए जा रहे हैं।
जहां कुछ मंदिर डिजिटल भुगतान, सीसीटीवी और पारदर्शी काउंटिंग सिस्टम पर जोर दे रहे हैं, वहीं कुछ जगहों पर रिकॉर्ड और जवाबदेही को लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं।