मुंबई | टाटा संस (Tata Sons) की गुरुवार को हुई बोर्ड बैठक में दो बड़े फैसले लिए गए। इसमें चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को अगले 5 साल के लिए फिर से कमान सौंपने का फैसला किया गया है। वहीं, RBI के सख्त नियमों की वजह से टाटा संस को शेयर बाजार में उतारने (IPO) पर भी सहमति बन गई है। एन. चंद्रशेखरन का यह तीसरा कार्यकाल होगा, जबकि उनका दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होने वाला था।
क्या है विवाद की असली वजह?
एन. चंद्रशेखरन और नोएल टाटा (Noel Tata) के बीच विवाद जगजाहिर है। नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन और रतन टाटा के सौतेले भाई हैं। बोर्ड बैठक में नोएल टाटा को छोड़कर बाकी सभी सदस्यों ने एकतरफा वोट एन. चंद्रशेखरन के पक्ष में किया।
नोएल टाटा का मानना है कि जब चंद्रशेखरन ने खुद पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी, तो बोर्ड को नया उत्तराधिकारी खोजना चाहिए था। उनका तर्क है कि टाटा समूह के नियम के मुताबिक एग्जीक्यूटिव 65 वर्ष की आयु में रिटायर्ड होते हैं, लेकिन 5 साल का विस्तार देने से चंद्रशेखरन 70 की उम्र तक पद पर बने रहेंगे। पिछले कुछ महीनों से दोनों के बीच एयर इंडिया, डिजिटल वर्टिकल के वित्तीय प्रदर्शन, भारी कर्ज और खर्चों को लेकर भी मतभेद सामने आए थे।
क्यों जरूरी हो गया Tata Sons का IPO?
RBI ने सितंबर 2022 में टाटा संस को अपर-लेयर NBFC के रूप में रजिस्टर्ड किया था। RBI के नियम के मुताबिक अपर-लेयर में आने वाली कंपनियों के लिए 3 साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी होता है। टाटा संस ने कर्ज चुकाकर खुद को CIC कैटेगरी से बाहर करने और लिस्टिंग से बचने के लिए मार्च 2024 में आवेदन दिया था, लेकिन 11 सितंबर 2026 को RBI ने इस अर्जी को खारिज कर दिया, जिससे कंपनी के लिए IPO लाना कानूनी मजबूरी बन गया है।
कितना बड़ा हो सकता है IPO?
टाटा संस की कुल असेट बेस मार्च 2026 तक करीब 2.01 लाख करोड़ रुपये है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर टाटा संस का IPO आता है, तो कंपनी का मूल्यांकन 7 लाख करोड़ से 11 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकता है। यह भारतीय बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा IPO साबित हो सकता है।
चंद्रशेखरन का टाटा ग्रुप में सफर
एन. चंद्रशेखरन करीब 40 साल से टाटा ग्रुप के साथ जुड़े हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत TCS से की और बाद में TCS के CEO और MD बने। फरवरी 2017 में उन्हें पहली बार टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था। उनके कार्यकाल में एयर इंडिया का अधिग्रहण, टाटा डिजिटल का विस्तार और टाटा ग्रुप के मार्केट कैप में दमदार बढ़ोतरी दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2020 में ग्रुप का रेवेन्यू 7.89 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया।
टाटा ग्रुप, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में फर्क
- टाटा ग्रुप: यह टाटा ब्रांड के तहत काम करने वाली सभी कंपनियों का एक विशाल अम्ब्रेला है, जिसमें TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाइटन, एयर इंडिया और ट्रेंट जैसी 30 से अधिक कंपनियां आती हैं।
- टाटा संस: यह पूरे टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी और प्रमोटर है, जो ग्रुप की रणनीतिक दिशा तय करती है और ‘टाटा’ ब्रांड के इस्तेमाल को नियंत्रित करती है।
- टाटा ट्रस्ट्स: यह सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट जैसे सामाजिक ट्रस्टों का संयुक्त निकाय है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे चैरिटी कामों के लिए समर्पित है। इसके पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी है।