ईरान अपनी मिसाइल तकनीक को इतना मजबूत कर चुका है कि अमेरिकी और इजरायली मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भी उसे रोकना मुश्किल हो रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरानी मिसाइलें अब तेज गति से उड़ती हैं, बीच में रास्ते में मुड़ जाती हैं और बेहतर निशाना लगाती हैं।
इससे पहले ये मिसाइलें आसानी से रोकी जा सकती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। कई विशेषज्ञों को शक है कि चीन या रूस ईरान को टारगेटिंग टेक्नोलॉजी और अन्य मदद दे रहे हैं।
‘फतह-1’ और ‘फतह-2’: गेम चेंजर मिसाइलें
ईरान ने ‘फतह-1’ और ‘फतह-2’ जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें विकसित की हैं, जो साउंड की स्पीड से पांच गुना तेज उड़ सकती हैं। ये मिसाइलें उड़ते समय दिशा बदल सकती हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना और रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।
ईरान का दावा है कि ये मिसाइलें अमेरिका और इजरायल की सबसे एडवांस डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम, एरो और THAAD को भी चकमा दे सकती हैं। हाल के हमलों में इन मिसाइलों ने कई इंटरसेप्टर को पार करके टारगेट हिट किया।
रूस की मदद: सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन
रूस ईरान को सैटेलाइट इमेजरी और बेहतर ड्रोन टेक्नोलॉजी दे रहा है, जो ईरान को अमेरिकी बलों को बेहतर तरीके से टारगेट करने में मदद कर रही है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, मॉस्को ने इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा दी है।
रूस को इस युद्ध से फायदा हो रहा है क्योंकि ईरान रूस को ड्रोन सप्लाई करता है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में हो रहा है। बदले में रूस ईरान को टेक्नोलॉजी और इमेजरी दे रहा है।
चीन का रोल और टारगेटिंग टेक
अमेरिकी अधिकारियों को शक है कि चीन भी ईरान को टारगेटिंग टेक्नोलॉजी में मदद कर रहा है। हालांकि सबूत कम हैं, लेकिन चीन की हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी दुनिया में सबसे आगे है।
ईरान और चीन के बीच तकनीकी सहयोग पुराना है। चीन ईरान को इंजीनियरिंग सपोर्ट और कंपोनेंट्स दे सकता है, जिससे ईरान की मिसाइलें ज्यादा सटीक और तेज बनी हैं।
रूस-चीन-ईरान का ‘ट्राएंगल’
यह कॉर्डिनेशन ट्राएंगल (रूस-चीन-ईरान) अमेरिका के लिए बड़ी चिंता का विषय है। अगर ईरान की मिसाइलें लगातार सफल होती रहीं तो क्षेत्रीय सुरक्षा का समीकरण बदल जाएगा।
जॉर्डन एयर बेस पर हाल के हमले में ईरानी मिसाइलों ने अमेरिकी सैनिकों की जान ली, जो इस नई क्षमता का प्रमाण है।
अमेरिका और इजरायल की चुनौतियां
अमेरिका और इजरायल अपनी डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हाइपरसोनिक थ्रेट के खिलाफ नई टेक्नोलॉजी की जरूरत है। THAAD और पैट्रियट जैसी सिस्टम पारंपरिक मिसाइलों के लिए बनी हैं।
हाइपरसोनिक मिसाइलों की लो अल्टीट्यूड फ्लाइट और रैंडम मैन्यूवर उन्हें मुश्किल बनाते हैं। इजरायल में आयरन डोम ने कई रॉकेट रोके, लेकिन लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलें अलग चुनौती हैं।