TMC के 20 बागी सांसदों ने रविवार को एक ऐसी पार्टी में शामिल होने का ऐलान किया, जिसका नाम है NCPI। इस फैसले के बाद यह छोटी-सी, लगभग अनजान पार्टी रातोंरात बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय पार्टी बन गई।
यह एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर है। बागी सांसदों के नेतृत्व में यह नया गुट अब बंगाल की राजनीति में एक नई ताकत के रूप में उभरा है।
NCPI क्या है?
NCPI का पूरा नाम है नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया। यह पार्टी मूल रूप से त्रिपुरा में रजिस्टर है, और चुनाव आयोग के हिसाब से यह एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है।
इसका मतलब यह है कि इस पार्टी को चुनाव आयोग की तरफ से कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। फिर भी, अब यह पार्टी बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय ताकत बन गई है।
2023 के पंचायत चुनाव में हुई थी बुरी हार
2023 के पंचायत चुनावों में इस पार्टी ने बंगाल में दो उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी।
दोनों उम्मीदवारों को कुल मिलाकर मात्र 822 वोट मिले थे। यह आंकड़ा बताता है कि पार्टी का जमीनी स्तर पर कोई अस्तित्व नहीं था।
पार्टी का दफ्तर एक आम घर
जब समाचार एजेंसी पीटीआई ने NCPI के बंगाल के रजिस्टर्ड पते पर जाकर देखा, तो वह जगह हावड़ा जिले के संकरैल इलाके में एक आम घर निकला।
यह प्रॉपर्टी उत्तिय कुंडू और उनकी पत्नी शेवली कुंडू के नाम पर है। पड़ोसियों ने बताया कि यह जोड़ा करीब 8 साल पहले नदिया जिले से यहां आकर बसा था।
गेट पर लगा था ऐसा बोर्ड
उस घर के मेन गेट पर एक बोर्ड लगा था, जिसमें उत्तिय कुंडू को ‘एक बांग्ला अखबार के संपादक, गणित के शिक्षक, ऑडिटर, स्वास्थ्य सलाहकार और योग स्वयंसेवक’ बताया गया था।
वहीं शेवली कुंडू को ‘कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील’ और ‘जमीन सर्वे में डिप्लोमाधारी’ बताया गया था। घर की दीवारों पर कई नारे भी लिखे थे।
दीवारों पर लिखे नारे
घर की एक दीवार पर ‘जागो बिस्वा’ का नारा लिखा था। दूसरी दीवार पर ‘असंगठित महिला कामगार संघ’ भी लिखा हुआ था।
पड़ोसियों के मुताबिक, इस प्रॉपर्टी से एक NGO भी चलाया जाता है जो सेल्फ हेल्प ग्रुप्स की महिलाओं को ट्रेनिंग देता है। यह एक सामान्य सी जगह थी।
CRPF की भारी तैनाती
सोमवार सुबह से ही इस घर के बाहर केंद्रीय अर्धसैनिक बल यानी CRPF की भारी तैनाती हो गई। यह दर्शाता है कि इस मामले को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।
एक छोटे से घर के बाहर इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था देखना हैरान करने वाला था।
पार्टी ने किया बड़ा दावा
20 TMC सांसदों के NCPI में शामिल होने की खबर के अगले ही दिन यानी सोमवार को पार्टी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली जिसमें लिखा, ’20 लोकसभा सीटों के साथ NCPI बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय ताकत बन गई है।’
यह दावा बेहद बड़ा है। पार्टी ने एक ग्राफिक भी शेयर किया जिसमें बंगाल की 42 लोकसभा सीटों का बंटवारा दिखाया गया था।
सीटों का बंटवारा
इस ग्राफिक के अनुसार, अब NCPI के पास 20 सीटें हैं, BJP के पास 12, TMC के पास 8 और कांग्रेस के पास 1 सीट है। यानी एक छोटी-सी पार्टी अब सबसे बड़ी ताकत बन गई है।
यह बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर है। एक पार्टी जो कभी पंचायत चुनाव भी नहीं जीत पाई, वह अब लोकसभा में सबसे बड़े गुट के रूप में उभरी है।
बागी सांसदों का स्वागत
पार्टी ने एक अलग पोस्ट में सभी 20 बागी सांसदों का स्वागत करते हुए कहा कि उनका ‘लंबा राजनीतिक अनुभव, जमीनी जुड़ाव और लोगों के प्रति प्रतिबद्धता पार्टी को मजबूत और समृद्ध बनाएगी।’
यह स्वागत संदेश बताता है कि पार्टी इस सौदे को लेकर कितनी उत्साहित है।
पार्टी के संस्थापक का बयान
उत्तर 24 परगना जिले में रहने वाले संतनु डे ने खुद को NCPI के संस्थापक सदस्यों में से एक और पार्टी का राष्ट्रीय संगठन सचिव बताया।
उन्होंने कहा, ‘यह हमारी पार्टी के लिए बढ़ने का मौका है। हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं और NDA के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहते हैं।’
‘दिल्ली बुलाएंगी तो जाऊंगा’
संतनु डे ने आगे कहा, ‘अगर काकोली घोष दस्तीदार मुझे दिल्ली बुलाएं तो मैं जाऊंगा और हम साथ मिलकर प्रेस को संबोधित करेंगे।’
यानी वह बागी सांसदों के नेता काकोली घोष दस्तीदार के संपर्क में हैं और आगे की योजना बना रहे हैं।
क्या है इस विलय का मतलब?
इस विलय का सीधा मतलब यह है कि TMC के बागी सांसद अब एक नई पार्टी के झंडे तले चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली है।
यह भी साफ हो गया है कि यह गुट NDA के साथ जाना चाहता है। यानी वह बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनना चाहते हैं।
बंगाल की राजनीति पर असर
इस घटनाक्रम का बंगाल की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। अब राज्य में चार मुख्य ध्रुव हो गए हैं – NCPI, BJP, TMC और कांग्रेस।
लेकिन NCPI सबसे बड़े गुट के रूप में उभरा है, भले ही इसकी अपनी कोई जमीनी ताकत न हो। यह एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग है।
NCPI की असली ताकत क्या है?
असल में NCPI की अपनी कोई ताकत नहीं है। उसके पास न तो कार्यकर्ता हैं, न ही जनाधार। उसकी पूरी ताकत उन 20 बागी सांसदों में है जो TMC छोड़कर आए हैं।
यानी यह एक ऐसी पार्टी है जिसे सांसद मिल गए, लेकिन जनता ने कभी वोट नहीं दिया। यह एक अनोखी स्थिति है।
आगे क्या होगा?
अब देखना यह होगा कि यह नया गुट आगामी चुनावों में कितना सफल होता है। क्या यह NDA के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगा या अकेले?
यह भी देखना है कि चुनाव आयोग इस विलय को मान्यता देता है या नहीं। फिलहाल तो यह सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है।