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बिजनेस

MBA की जरूरत नहीं, बिना डिग्री ही बन रहे करोड़ों के स्टार्टअप फाउंडर्स! क्या आपने देखा ये नया ट्रेंड?

SMW NEWS BUREAU
Last updated: 09/04/2026 11:38 AM
By SMW NEWS BUREAU 3 Min Read
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फोर्ब्स की रिपोर्ट में खुलासा, मिलेनियल फाउंडर्स अब ‘कॉर्पोरेट इनक्यूबेटर्स’ को कर रहे तरजीह, इसे ‘रिटेल का MBA’ कहा जा रहा है, भारत में भी बढ़ रही लोकप्रियता

बिजनेस की दुनिया में पैर जमाने के लिए अब सिर्फ टॉप बी-स्कूल (B-school) की डिग्री ही काफी नहीं है। फोर्ब्स (Forbes) की एक हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, आज के मिलेनियल फाउंडर्स (millennial founders) पारंपरिक MBA (traditional MBA) और वेंचर कैपिटल फेलोशिप (venture capital fellowship) के बजाय ‘कॉर्पोरेट इनक्यूबेटर्स’ (corporate incubators) को तरजीह दे रहे हैं।

इसे ‘रिटेल का MBA’ (MBA of retail) कहा जा रहा है, जहां किताबी थ्योरी (bookish theory) नहीं, बल्कि धंधे की असली बारीकियां सिखाई जाती हैं।

क्यों फेल हो रहा है पारंपरिक MBA का फॉर्मूला?

रिपोर्ट में MAED की फाउंडर डेनिस वसी (Denise Vasi) का उदाहरण दिया गया है। डेनिस के मुताबिक, इनक्यूबेटर्स (incubators) सालों की जानकारी को कुछ महीनों (few months) में समेट देते हैं। यहां आप सिर्फ ब्रांडिंग (branding) नहीं, बल्कि ऑपरेशंस (operations), डेटा (data) और बिजनेस को ‘स्केल’ (scale) करना सीखते हैं।

आज का युवा वर्ग ‘लीनियर करियर’ (linear career) में यकीन नहीं रखता। वे फ्रीलांसिंग (freelancing) और पर्सनल ब्रांडिंग (personal branding) के दौर में पले-बढ़े हैं, इसलिए वे दो साल क्लासरूम (classroom) में बैठने के बजाय सीधे ‘मैदान’ (field) में उतरकर सीखना चाहते हैं।

इनक्यूबेटर बनाम MBA: क्या है अंतर?

  1. रियल-टाइम इंफ्रास्ट्रक्चर (Real-time Infrastructure): MBA में आप पुराने केस स्टडीज (case studies) पढ़ते हैं, जबकि कई इनक्यूबेटर्स में आप सीधे सप्लाई चेन (supply chain), लॉजिस्टिक्स (logistics) और इन्वेंट्री मैनेजमेंट (inventory management) पर काम करते हैं।
  2. नेटवर्किंग और मार्केट एक्सेस (Networking & Market Access): सेफोरा (Sephora) के प्रोग्राम का उदाहरण लें तो 2016 से अब तक इसने 40 से ज्यादा ब्रांड्स (40+ brands) को सपोर्ट किया है, जिनमें से आधे से ज्यादा को नेशनल रिटेल स्टोर्स (national retail stores) में जगह मिली। यह वह ‘मार्केट एक्सेस’ (market access) है जो कोई डिग्री नहीं दिला सकती।
  3. ऑपरेशंस (Operations): डेनिस कहती हैं कि सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि सिर्फ एक अच्छा प्रोडक्ट और मार्केटिंग काफी है। किसी ब्रांड की असली रीढ़ (backbone) उसका ‘ऑपरेशन’ होता है, जो इनक्यूबेटर्स में सिखाया जाता है।

फंडिंग के लिए अब ‘गिड़गिड़ाना’ बंद

फोर्ब्स की रिपोर्ट एक और अहम बदलाव की ओर इशारा करती है। अब फाउंडर्स (founders) शुरुआती दौर में ही बाहर से पैसा (वेंचर कैपिटल) उठाने के बजाय खुद के दम पर ‘प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट’ (proof of concept) तैयार करने पर जोर दे रहे हैं। वे अपनी कंपनी पर अपना कंट्रोल (control) और ऑटोनॉमी (autonomy) चाहते हैं।

भारत के संदर्भ में क्या है इसके मायने?

भारत (India) में भी JioGenNext, गूगल फॉर स्टार्टअप्स (Google for Startups) और NASSCOM 10,000 स्टार्टअप्स (NASSCOM 10,000 Startups) जैसे प्रोग्राम्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। भारतीय युवा भी अब मोटी फीस वाले MBA के बजाय इन इनक्यूबेटर्स की ओर देख रहे हैं, जहां उन्हें मेंटरशिप (mentorship) के साथ-साथ ग्लोबल मार्केट (global market) तक पहुंच मिलती है।

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