मुंबई | फिल्मों को अक्सर मनोरंजन का पर्याय माना जाता है, लेकिन कुछ फिल्में समाज को जागरूक करने, झकझोरने और सोचने पर मजबूर करने के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। साउथ इंडियन फिल्मकार चेतन डीके की पहली हिंदी फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ भी इसी श्रेणी में आती है। यह फिल्म हमारे भोजन में बढ़ते कीटनाशकों के उपयोग और उससे होने वाली गंभीर बीमारियों, खासकर कैंसर, के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास करती है। 24 जुलाई को रिलीज हुई इस फिल्म में काजल अग्रवाल, श्रेयस तलपडे और बाल कलाकार त्रिशा शारदा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।
क्या है ‘द इंडिया स्टोरी’ की कहानी?
फिल्म की कहानी एक पूर्व आर्मी ऑफिसर मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपडे) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी सात साल की बेटी परी (त्रिशा शारदा) को अचानक ब्लड कैंसर का पता चलता है। योगेश अपनी बेटी के इलाज में अपना सब कुछ झोंक देता है, लेकिन वह उसे बचा नहीं पाता। बाद में उसे पता चलता है कि परी की बीमारी का कारण उसके खाने में मौजूद खतरनाक कीटनाशक थे। इस सच्चाई से मुंह मोड़ने के बजाय, योगेश एक मुहिम छेड़ देता है और वह सरकार, कीटनाशक कंपनियों और किसानों तक को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता है।
इस लड़ाई में उसका साथ देती हैं एडवोकेट अर्चना (काजल अग्रवाल) , जो इस मामले को अदालत तक पहुंचाकर देश में कीटनाशकों के इस्तेमाल से बढ़ते कैंसर के खतरे को उजागर करना चाहती हैं। क्या योगेश और अर्चना की यह लड़ाई रंग लाती है? क्या वे बड़ी कंपनियों और व्यवस्था को हिला पाते हैं? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
कैसा है फिल्म का निर्देशन और पटकथा?
लेखक सागर बी. शिंदे की यह सच्ची घटनाओं से प्रेरित कहानी, विषय के स्तर पर बेहद दमदार, सामयिक और जरूरी है। फिल्म इस मुद्दे की गंभीरता को दिखाने के लिए पंजाब की ‘कैंसर ट्रेन’ से लेकर केरल के कैंसर क्षेत्र तक का सफर कराती है। यह साफ दिखाती है कि कैसे अच्छी पैदावार के लिए फलों-सब्जियों पर खतरनाक रसायनों का छिड़काव हो रहा है और कैसे मिलावटी दूध हमारे घरों तक पहुंच रहा है।
लेकिन, डायरेक्टर चेतन डीके इस मजबूत मुद्दे को उतने ही दमदार सिनेमाई अनुभव में नहीं बदल पाते हैं। कोर्ट रूम ड्रामा और इमोशनल ट्रैजिडी के बीच बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले दर्शकों को बांधने में असफल रहता है। फिल्म का पहला भाग कई बार डॉक्यूमेंट्री जैसा अहसास करवाता है, जो कहानी के प्रवाह को तोड़ता है। कोर्टरूम के दृश्य भी एकतरफा लगते हैं, जहां नायिका के सामने होने के बावजूद वकीलों के बीच कोई दमदार तर्क-वितर्क नहीं दिखता।
कलाकारों का प्रदर्शन कैसा है?
फिल्म में काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपडे अपनी अदाकारी से उतना प्रभावित नहीं कर पाते, जितना उम्मीद की जाती है। हालांकि, उन पर बाल कलाकार त्रिशा शारदा की मासूम अदाकारी भारी पड़ती है। उनके भाव, संवाद और उपस्थिति फिल्म में जान डालते हैं। एक छोटी सी भूमिका में मुरली शर्मा ने अच्छा अभिनय किया है और वे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
कुल मिलाकर कैसी है फिल्म?
‘द इंडिया स्टोरी’ एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन की कसौटी पर सामान्य खड़ी उतरती है, लेकिन यह समाज के लिए एक अहम संदेश जरूर देती है। यह हमें हमारी रोजमर्रा की खाद्य सुरक्षा के प्रति सचेत करती है। अगर आप कीटनाशकों के दुष्प्रभावों को समझना चाहते हैं और एक जागरूकता फिल्म देखने का मन है, तो आप इसे देख सकते हैं। लेकिन अगर आप मनोरंजन, बेहतरीन अभिनय और मजबूत पटकथा की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ी निराश कर सकती है।