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बिजनेस

‘खलनायक’ नहीं रहा कच्चा तेल, अब आम आदमी पर इससे मंडरा रहा बड़ा खतरा, जेब पर पड़ेगा भारी असर

SMW NEWS BUREAU
Last updated: 19/06/2026 10:07 PM
By SMW NEWS BUREAU 5 Min Read
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अब तक मिडिल ईस्ट में जंग के चलते अर्थशास्त्री लगातार चेतावनी दे रहे थे कि यह संघर्ष महंगाई के लिए बड़ा खतरा बन जाएगा। ऐसा हुआ भी। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी महंगे हो गए।

Contents
कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावटमहंगाई पर क्या था असर?अब नया खतरा: कमजोर मानसूनक्यों है मानसून इतना जरूरी?कच्चे तेल से ज्यादा बड़ा संकटसब्जियों और दालों पर दोहरा असरमिडिल क्लास पर कितना असर?निम्न आय वर्ग पर सबसे ज्यादा मारक्या कहते हैं आरबीआई के आंकड़े?क्या है निष्कर्ष?

लेकिन अब जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है और होर्मुज स्ट्रेट खुल गया है, तो कच्चा तेल ‘खलनायक’ नहीं रहा। US-Iran डील के बाद से क्रूड ऑयल लगातार टूट रहा है।

कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक 100-110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचकर दुनिया को डरा रहा था। लेकिन अमेरिका-ईरान शांति समझौते के ऐलान के साथ ही ब्रेंट क्रूड की कीमत फिसलकर 77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।

इस गिरावट से महंगाई का जोखिम भी कम हो गया है। होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से तेल की सप्लाई चेन से जुड़ी बाधाएं खत्म हो रही हैं।

महंगाई पर क्या था असर?

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर साफ देखने को मिला। देश में खुदरा महंगाई दर मई में बढ़कर 3.93% हो गई, जो अप्रैल में 3.48% थी।

फूड प्रोडक्ट्स की कीमतों में उछाल और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने इसमें अहम रोल निभाया। थोक महंगाई भी मई में 9.68% तक पहुंच गई।

अब नया खतरा: कमजोर मानसून

जहां कुछ सप्ताह पहले तक कच्चे तेल को लेकर महंगाई पर चर्चा हो रही थी, वहीं अब विशेषज्ञों का मानना है कि असली खतरा कुछ और है। इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मनोरंजन शर्मा ने कहा कि आज देश में महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम तेल नहीं, बल्कि मानसून है।

कमजोर मानसून अब भारत के लिए कच्चे तेल की तुलना में महंगाई का बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। क्योंकि भारत में महंगाई की कैलकुलेशन में ईंधन की कीमतों से कहीं ज्यादा खाद्य पदार्थों का रोल होता है।

क्यों है मानसून इतना जरूरी?

भारत की लगभग आधी कृषि भूमि बारिश पर निर्भर है। अगर मानसून कमजोर रहता है, तो अनाज, दालों, सब्जियों, फलों और तिलहन के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है।

इससे महंगाई दर में तेज इजाफा हो सकता है और घरेलू बजट गड़बड़ा सकता है। जब उत्पादन कम होगा तो कीमतें बढ़ेंगी।

कच्चे तेल से ज्यादा बड़ा संकट

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सिर्फ ट्रांसपोर्टेशन को प्रभावित करती हैं। जबकि कम बारिश का सीधा असर उन रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं पर पड़ता है जिन्हें परिवार रोजाना खरीदता है।

उपभोक्ताओं के लिए, कमजोर मानसून का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव सब्जी बाजार और किराना स्टोर पर महसूस होता है। यह सीधे आम आदमी की जेब पर वार करता है।

सब्जियों और दालों पर दोहरा असर

डॉ. मनोरंजन शर्मा के अनुसार, कमजोर मानसून, खासकर अल नीनो की स्थिति में, खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण घरेलू खर्चों में काफी वृद्धि होती है।

कम बारिश अक्सर सब्जियों, दालों, खाद्य तेलों और दूध की महंगाई को दोहरे अंकों तक पहुंचा देती है। यानी रोजाना की खरीदारी के लिए आपको ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।

मिडिल क्लास पर कितना असर?

मिडिल क्लास के शहरी परिवार के लिए, कमजोर मानसून से मंथली खर्च में 1,000 रुपये से 3,000 रुपये तक की बढ़ोतरी का अनुमान है।

यानी हर महीने आपको खाने-पीने की चीजों पर पहले से ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं। यह बड़ी रकम है।

निम्न आय वर्ग पर सबसे ज्यादा मार

निम्न आय वर्ग के परिवार अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि उनके खर्च का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। अगर खाने की चीजें महंगी हो गईं, तो उनके लिए गुजारा करना और मुश्किल हो जाएगा।

यह सबसे गंभीर पहलू है। जो लोग पहले से ही संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा।

क्या कहते हैं आरबीआई के आंकड़े?

रिजर्व बैंक ने भी ऊर्जा की बढ़ती लागत और ग्लोबल अनिश्चितता का हवाला देते हुए FY2027 के लिए अपने महंगाई दर के अनुमान को 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है।

अगर मानसून कमजोर रहता है और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह अनुमान और भी ऊपर जा सकता है।

क्या है निष्कर्ष?

अब तक कच्चा तेल महंगाई का मुख्य कारण था, लेकिन अब वह खतरा कम हो गया है। नया खतरा मानसून है।

अगर बारिश सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में नहीं हुई, तो खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इसलिए सरकार और आम जनता दोनों को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए।

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