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मैसूर दशहरा: 54 साल के हाथी प्रशांत ने पहली बार उठाया 750 किलो का हौदा

SMW NEWS BUREAU
Last updated: 22/10/2026 10:28 AM
By SMW NEWS BUREAU 8 Min Read
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मैसूर की सड़कों पर हजारों लोग जमा थे। महल से निकलने वाले जुलूस का इंतजार हो रहा था। सामने सजे-धजे हाथी थे, लोक कलाकार थे, अलग-अलग इलाकों की संस्कृति दिखाती झांकियां थीं। लेकिन सबकी निगाहें एक हाथी पर टिकी थीं। नाम है प्रशांत… उम्र 54 साल… इस बार उसे एक ऐसी जिम्मेदारी मिली थी, जो मैसूर दशहरा की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।

Contents
1610 से जुड़ी है परंपराराजपरिवार ने की पारंपरिक पूजाप्रशांत के लिए क्यों खास था यह दशहरा?पांच किलोमीटर का जुलूसदीपालंकारा से ड्रोन शो तकइस बार एक पुरानी रस्म नहीं हुई1971 के बाद क्या बदला?

प्रशांत की पीठ पर रखा था करीब 750 किलो का सुनहरा हौदा… इसमें विराजमान थीं देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा… हौदे के आने पर तोपों से 21 गोलों की सलामी दी गई। फिर फूल बरसाए गए और जुलूस आगे बढ़ चला।

बुधवार को कर्नाटक के मैसूर में दशहरा उत्सव का समापन इसी भव्य जुलूस के साथ हुआ। इसे ‘जंबू सवारी’ कहा जाता है। 11 दिन तक चले उत्सव का यह सबसे बड़ा आकर्षण था। मगर इस जुलूस की खास बात सिर्फ हाथी, सोना और शाही सजावट नहीं है। इसके पीछे 400 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा की कहानी है।

1610 से जुड़ी है परंपरा

मैसूर दशहरा को कर्नाटक का राज्य उत्सव यानी ‘नाडा हब्बा’ कहा जाता है। इसकी परंपरा 1610 से जुड़ी है, जब मैसूर के वाडियार शासक राजा वाडियार प्रथम ने इसे शुरू किया था। इसकी जड़ें विजयनगर साम्राज्य के समय मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव से भी जुड़ी हैं।

पुराने जमाने में विजयादशमी के दिन राजा इसी शाही जुलूस का हिस्सा बनते थे। वे सुनहरे हौदे पर बैठकर निकलते थे। मैसूर के आखिरी शासक जयचामराजेंद्र वाडियार भी इस परंपरा का हिस्सा रहे। वक्त बदला, राजशाही का दौर खत्म हुआ, लेकिन जुलूस की परंपरा खत्म नहीं हुई।

अब राजा की जगह हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा विराजती है। चामुंडेश्वरी को मैसूर की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इस तरह जुलूस का स्वरूप बदला, मगर उसके साथ जुड़ी शाही विरासत आज भी कायम है।

राजपरिवार ने की पारंपरिक पूजा

इस बार मैसूर के पूर्व राजपरिवार के वंशज यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार ने भी महल परिसर में पारंपरिक पूजा की। उन्होंने अंबा विलास महल से भुवनेश्वरी देवी मंदिर तक ‘विजय यात्रा’ निकाली और वहां शमी के पेड़ की विशेष पूजा की।

प्रशांत के लिए क्यों खास था यह दशहरा?

मैसूर दशहरा में हाथियों की भूमिका अहम होती है। जंबू सवारी में करीब एक दर्जन सजे-धजे हाथी शामिल हुए। लेकिन इस बार मुख्य आकर्षण प्रशांत था, क्योंकि उसने पहली बार देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा वाला सुनहरा हौदा उठाया।

इस हौदे को ‘अंबारी’ भी कहा जाता है। इसका कुल वजन करीब 750 किलो है। इसकी लकड़ी के स्ट्रक्चर पर करीब 80 किलो सोना चढ़ा हुआ है। प्रशांत के साथ कावेरी और रूपा नाम के दो ‘कुमकी’ हाथी भी चल रहे थे। कुमकी हाथियों को दूसरे हाथियों को संभालने और कंट्रोल करने के काम में ट्रेनिंग दी जाती है। किसी इमरजेंसी के लिए ‘धनंजय’ को रिजर्व हाथी रखा गया था।

जुलूस में अभिमन्यु ने ‘निशाने हाथी’ की भूमिका निभाई, जबकि गोपी ‘नौपत हाथी’ के रूप में शामिल हुआ। एक-एक हाथी की भूमिका तय थी। यहां हाथियों की मौजूदगी केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक व्यवस्थित परंपरा का हिस्सा है।

पांच किलोमीटर का जुलूस

जंबू सवारी की शुरुआत से पहले महल के बलराम द्वार पर नंदी ध्वज की पूजा की गई। इसके बाद मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और दूसरे लोगों ने देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए। शुभ मुहूर्त में जुलूस को आगे बढ़ाया गया। करीब पांच किलोमीटर के रास्ते पर जुलूस निकला और बन्नीमंटप पहुंचकर इसका समापन हुआ।

रास्ते में अलग-अलग जिलों की संस्कृति, लोक परंपराओं और विरासत को दिखाती झांकियां शामिल थीं। सरकारी विभागों की योजनाओं और सामाजिक संदेशों पर आधारित झांकियां भी निकाली गईं।

इस बार उत्सव में एक नया रंग भी देखने को मिला। पड़ोसी राज्यों की सांस्कृतिक टोलियों और झांकियों के साथ-साथ सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी झांकियां भी जुलूस का हिस्सा बनीं। कन्नड़ फिल्म जगत के कलाकारों और खेल हस्तियों ने भी भाग लिया। इनमें पूर्व भारतीय क्रिकेटर अनिल कुंबले का नाम भी शामिल था।

केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी भी शामिल हुए। अलग-अलग राज्यों के नेताओं और विदेशी प्रतिनिधियों की मौजूदगी भी रही।

दीपालंकारा से ड्रोन शो तक

मैसूर में दशहरा का मतलब केवल विजयादशमी का जुलूस नहीं है। उत्सव के दिनों में अंबा विलास महल और शहर की प्रमुख सड़कों, चौराहों व इमारतों को रोशनी से सजाया गया। इस रोशनी को ‘दीपालंकारा’ कहा जाता है।

शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ फूड फेयर, फूलों की प्रदर्शनी, किसानों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों के लिए अलग-अलग आयोजन हुए। कवि सम्मेलन, एयर शो, ड्रोन शो और प्रदर्शनी भी लगी।

महल के भीतर नवरात्र के दौरान रोजाना पारंपरिक पूजा होती रही। इनमें ‘खासगी दरबार’ भी शामिल था। इस रस्म में वाडियार वंश के प्रमुख स्वर्ण सिंहासन पर बैठते हैं और वैदिक मंत्रों के बीच अनुष्ठान किए जाते हैं।

इस बार एक पुरानी रस्म नहीं हुई

इतने भव्य आयोजन के बीच एक परंपरा इस बार नहीं निभाई गई। महल के कार्यक्रमों में आम तौर पर ‘वज्रमुष्टि कलगा’ भी शामिल होता है। यह जेट्टी पहलवानों के बीच होने वाला पारंपरिक मुकाबला है, जिसमें वे ‘वज्रमुष्टि’ नाम का विशेष हथियार इस्तेमाल करते हैं। इस साल यह मुकाबला नहीं हुआ। सूत्रों ने इसकी वजह समय को लेकर तालमेल की कमी बताई।

1971 के बाद क्या बदला?

मैसूर दशहरा की कहानी में एक दिलचस्प मोड़ 1971 के बाद आया। पूर्व शासकों के विशेषाधिकार समाप्त होने के बाद उत्सव राजपरिवार का निजी आयोजन बनकर रह गया। स्थानीय लोगों की पहल से इसे सीमित स्तर पर जारी रखा गया। फिर 1975 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डी. देवराज उर्स की सरकार ने उत्सव को दोबारा बड़े स्तर पर शुरू कराया। इसके बाद से यह आयोजन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की देखरेख में आगे बढ़ता रहा।

आज मैसूर दशहरा में राजा खुद हौदे पर बैठकर नहीं निकलते। उनकी जगह देवी की प्रतिमा निकलती है। लेकिन जुलूस का रास्ता, शाही महल, सजे हुए हाथी और सोने से ढका अंबारी अब भी उस दौर की याद दिलाते हैं, जब मैसूर की सत्ता राजपरिवार के हाथ में थी।

इस बार 54 साल के प्रशांत ने पहली बार सुनहरा हौदा उठाया। हजारों लोग उसके साथ चलती देवी की सवारी देखने पहुंचे। और 11 दिनों तक शहर को उत्सव में रंगने वाला दशहरा आखिरकार अपने सबसे भव्य नजारे के साथ विदा हो गया। मैसूर की इस परंपरा की खासियत शायद यही है—समय बदलता रहा, सत्ता बदली, रस्मों का रूप बदला, लेकिन विजयादशमी पर निकलने वाली जंबू सवारी आज भी शहर की पहचान बनी हुई है।

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