अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड) की कीमत ईरान संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर पर पहुंच गई है। इससे भारत को काफी फायदा हो सकता है। एक ओर जहां महंगाई का जोखिम कम होगा, वहीं वित्तीय स्थिति में सुधार होगा।
इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड लुढ़ककर लगभग 72-73 डॉलर प्रति बैरल पर रह गया, जबकि अमेरिकी क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चला गया।
जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम खत्म
इससे वह जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम खत्म हो गया, जिसकी वजह से इस साल की शुरुआत में संघर्ष के चरम पर कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।
दोनों बेंचमार्क अब फरवरी के आखिर के स्तर के करीब आ गए हैं। तब मिडिल ईस्ट के एनर्जी मार्केट में तनाव नहीं बढ़ा था।
पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस
कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद गुरुवार को रिटेल फ्यूल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। हाल ही में इंटरनेशनल ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी।
लेकिन, इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी फ्यूल रिटेलर्स ने अब तक पंप की कीमतों में कटौती नहीं की है।
क्यों नहीं घटे पेट्रोल-डीजल के दाम?
अधिकारियों ने बताया कि तीन सरकारी फ्यूल रिटेलर्स अभी पेट्रोल पर अच्छा मार्केटिंग मार्जिन कमा रहे हैं। हालांकि, डीजल की बिक्री से अभी भी थोड़ा नुकसान हो रहा है।
कंपनियों ने ग्लोबल क्रूड की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद लगभग ढाई महीने तक रिटेल कीमतें स्थिर रखी थीं। उसके बाद ही थोड़ी बढ़ोतरी की थी।
कीमतें कैसे तय होती हैं?
इंडस्ट्री के अधिकारियों ने बताया कि फ्यूल की कीमतें इंटरनेशनल क्रूड मार्केट में रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर तय नहीं की जाती हैं।
इसके बजाय आमतौर पर पिछले दो हफ्तों या महीने की औसत ऑयल कीमतों के आधार पर तय होती हैं। नतीजतन, अगर इंटरनेशनल दरें कम बनी रहती हैं तो क्रूड की कीमतों में हालिया गिरावट का फायदा पंप तक पहुंचने में समय लग सकता है।
सरकार ने रोक दीं ब्रीफिंग
ऑयल मार्केट में तनाव कम होने का असर सरकार के रुख में भी दिखा है। संघर्ष शुरू होने के बाद शुरू की गई अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग चुपचाप रोक दी गई हैं।
इससे पता चलता है कि एनर्जी सप्लाई में तत्काल रुकावट की चिंता कम हो गई है। इस हफ्ते सोमवार और गुरुवार को तय दिनों पर कोई ब्रीफिंग नहीं हुई।
शुरुआत में रोजाना होती थीं ब्रीफिंग
शुरुआत में रोजाना और बाद में हफ्ते में दो बार होने वाली इन ब्रीफिंग में प्रमुख मंत्रालयों के अधिकारी देश की तैयारी और संकट के प्रबंधन के बारे में जनता को जानकारी देते थे।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारी नियमित रूप से इसमें शामिल होते थे। फ्यूल सप्लाई को सुरक्षित रखने और मार्केट में स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते थे।
भारत की क्रूड बास्केट में बदलाव
भारत जो कच्चा तेल खरीदता है, उसकी बास्केट की औसत कीमत 27 फरवरी को 71.17 डॉलर प्रति बैरल थी। यह वह दिन था जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था।
ऑयल मिनिस्ट्री के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के डेटा के अनुसार, 24 जून को इंडियन बास्केट की औसत कीमत 70.71 डॉलर प्रति बैरल थी।
क्या दबाव बढ़ेगा?
ब्रेंट क्रूड के अब संघर्ष से पहले के स्तर के करीब पहुंचने के साथ फ्यूल रिटेलर्स और सरकार पर कुछ फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने का दबाव बढ़ने की संभावना है।
खासकर अगर क्रूड लंबे समय तक हाल के सबसे ऊंचे स्तर से नीचे रहता है। फ्यूल की कम कीमतें महंगाई के दबाव को और कम कर सकती हैं।
होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आवाजाही सामान्य
यह गिरावट होर्मुज स्ट्रेट से टैंकर ट्रैफिक के सामान्य होने के बाद आई है, जहां से दुनिया के लगभग पांचवें-हिस्से का तेल गुजरता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से कम से कम 2 करोड़ बैरल तेल गुजरा है। ऑयल फ्लो युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंच गया है।
भारत को होंगे ये 5 बड़े फायदे
भारत के लिए तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की गिरावट का मतलब है सालाना आयात बिल में अरबों डॉलर की बचत। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) को कम करने में मदद मिलती है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 फीसदी से ज्यादा आयात करता है। तेल की कम कीमतें एविएशन, पेंट, केमिकल, लॉजिस्टिक्स और कंज्यूमर गुड्स जैसे सेक्टर के लिए खास तौर पर फायदेमंद हैं।
रुपया मजबूत होगा, महंगाई घटेगी
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से डॉलर की मांग कम होती है। इससे रुपये की स्थिति भी मजबूत होती है। कारण है कि एनर्जी इंपोर्ट के लिए डॉलर की जरूरत कम पड़ती है।
तेल का बिल कम होने से आयातित महंगाई को काबू में रखने और घरेलू खपत को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। यह भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ का एक मुख्य फैक्टर है।
क्या संकेत देती है कीमतों में नरमी?
बाजार के जानकारों का कहना है कि कीमतों में आई इस तेज गिरावट से पता चलता है कि सप्लाई में रुकावट का डर कम होते ही जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम कितनी तेजी से खत्म हो सकते हैं।
इस महीने ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 20 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। यह संघर्ष के दौरान पहुंचे सबसे ऊंचे स्तर से लगभग 30 फीसदी नीचे है।
RBI को मिलेगी राहत
भारत रिजर्व बैंक के लिए अगर महंगाई काबू में रहती है तो ऊर्जा की कम कीमतें ‘अकोमोडेटिव’ (नरम) मॉनेटरी पॉलिसी का रुख बनाए रखने के पक्ष को और मजबूत कर सकती हैं।
इससे आर्थिक गतिविधियों को अतिरिक्त बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, विश्लेषकों ने आगाह किया है कि मिडिल ईस्ट में जियोपॉलिटिकल जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।