राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार शाम नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कार 2026 प्रदान किए। इस खास मौके पर उन्होंने 65 पद्म पुरस्कार प्रदान किए।
समारोह में सम्मानित किए गए अलग-अलग क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों में अभिनेता ममूटी, अलका याग्निक, आर माधवन और दिवंगत एक्टर सतीश शाह को सम्मानित किया गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह भी उपस्थित थे।
पीएम मोदी ने दिखाई संवेदनशीलता
नामों की इस लंबी फेहरिस्त के बीच नाम पुकारा गया प्रोफेसर मंगला कपूर का, उन्हें ‘काशी की लता’ नाम से जाना जाता है। वह जब आईं तो उन्होंने आगे बढ़ते हुए दीर्घा में मौजूद सभी को प्रणाम करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूने के लिए झुकीं।
लेकिन इससे पहले ही पीएम मोदी ने उनके दोनों हाथों को थामकर अपने माथे से लगा लिया और उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगला कपूर को पद्मश्री सम्मान से नवाजा।
साहस, संकल्प और संगीत का मिश्रण
मंगला कपूर को पद्म सम्मान मिलना इसलिए भी खास हो जाता है क्योंकि उनकी जिंदगानी साहस, संकल्प और संगीत तीनों का अद्भुत मिश्रण है।
उनकी एक पहचान एसिड अटैक सर्वाइवर की है, लेकिन उन्होंने खुद को ‘पीड़िता’ कहलाने और पहचाने जाने के बजाय संगीत को अपनी पहचान बना लिया।
‘काशी की लता’ के नाम से मशहूर
भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी गायिका और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर मंगला कपूर साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए सम्मानित की गई हैं।
उन्हें ‘काशी की लता’ के नाम से भी जाना जाता है। यह खिताब उन्हें उनकी मधुर आवाज और शास्त्रीय संगीत में महारत के लिए मिला।
12 साल की उम्र में हुआ था एसिड अटैक
मंगला कपूर जब 12 साल की ही थीं तो पारिवारिक दुश्मनी के चलते उन पर एसिड अटैक हुआ था। इस हमले के बाद वह 6 साल अस्पताल में रहीं और ऑपरेशन के कई दौर से गुजरीं।
इस घटना के बाद न सिर्फ मंगला बल्कि उनका परिवार भी आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुका था, लेकिन मंगला जीवित थीं उस समय परिवार के लिए यही सबसे बड़ी बात थी।
संगीत ही बना उनका सहारा
एसिड अटैक के बाद अवसाद से बाहर निकलने में संगीत ही उनका सहारा बना। उनके पिता ने भी इस दुख से उनका ध्यान बंटाने के लिए उन्हें संगीत से जुड़ने की प्रेरणा दी।
और फिर धीरे-धीरे संगीत ही उनका जीवन बनता चला गया। दर्द की दवा बना संगीत कब निजी तौर पर उनकी पहचान बन गया, इसका पता भी तब चला जब एक कार्यक्रम में उन्हें ‘काशी की लता’ नाम से नवाजा गया।
ग्वालियर घराने की संगीत शैली
मंगला कपूर की संगीत गायन शैली ग्वालियर घराने की है। उन्होंने इस घराने की बारीकियों को बखूबी आत्मसात किया है।
उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की विशेषताएं साफ झलकती हैं। उन्होंने संगीत के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनाई।
‘बनारस की लता’ कैसे बनीं?
मंगला कपूर ने एक मीडिया बातचीत में बताया था कि साल 1982 में उन्हें पटना में गायन के लिए आमंत्रण मिला था। जब वह वहां पहुंची तो आयोजक बिदक गए।
उनके साथ गए एक सहयोगी ने बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने आयोजकों को सलाह दी कि जब मैं मंच पर गाने आऊं तो स्टेज पर लाइट बंद रहे। ऐसा ही किया गया।
गायन पूरा होने पर खूब बजी तालियां
गायन पूरा होने के बाद लाइट जलाई गई और तब श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं। इसी कार्यक्रम में मुझे ‘बनारस की लता मंगेशकर’ कहकर पहली बार पुकारा गया।
उसके बाद बनारस की तरंग संस्था ने विधिवत इस खिताब से नवाजा। यह उनके संघर्ष और प्रतिभा की सबसे बड़ी पहचान है।