यमन में हूती विद्रोहियों के हमले तेज होने और सऊदी अरब की सुरक्षा पर बढ़ते खतरे के बीच पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का डिफेंस पैक्ट के बावजूद इस समय तक पाकिस्तान ने सऊदी अरब की मदद के लिए कोई नई सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं की है। पाकिस्तान ने हालांकि समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
सऊदी अरब पर लगातार बढ़ रहे हूती हमले
यमन में हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के खिलाफ ड्रोन और मिसाइल हमले बढ़ाए हैं। इसी बीच यमन में संघर्ष भी तेज हुआ है और हूतियों ने लाल सागर तथा बाब अल-मंदेब क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की है। इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब की महत्वपूर्ण तेल अवसंरचना भी हमलों की चपेट में आई है। एक प्रमुख तेल पाइपलाइन पर हमले के बाद ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक तेल बाजार पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ी है।
मक्का पैक्ट में क्या है?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ मक्का डिफेंस एग्रीमेंट सामूहिक सुरक्षा सहयोग पर आधारित है। समझौते के तहत किसी सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे साझा सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा जाता है।
हालांकि, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि हूती हमलों के बाद अभी तक समझौते के तहत किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान ने कहा है कि वह समझौते के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन तत्काल सैन्य कदम पर कोई फैसला नहीं हुआ है।
पाकिस्तान ने सेना भेजने से क्यों किया परहेज?
पाकिस्तान की स्थिति फिलहाल काफी सावधानी भरी है। इस्लामाबाद ने सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग का समर्थन किया है, लेकिन यमन के संघर्ष में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखने के संकेत दिए हैं।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने यह भी कहा है कि समझौते के विभिन्न पहलुओं को लागू करने में अभी समय लगेगा। पाकिस्तान के कुछ सैनिक पहले से ही सऊदी अरब में प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक भूमिकाओं में मौजूद हैं, लेकिन यह हूतियों के खिलाफ नई युद्धक तैनाती के बराबर नहीं है।
सऊदी के लिए बढ़ती चुनौती
हूती हमलों के कारण सऊदी अरब के सामने एक साथ कई मोर्चों पर चुनौती खड़ी हो रही है। यमन में हूतियों की सैन्य बढ़त, लाल सागर के आसपास अस्थिरता और तेल ढांचे पर हमले क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर हमले और तेज होते हैं तथा सऊदी अरब औपचारिक रूप से सैन्य सहायता की मांग करता है, तो मक्का पैक्ट की वास्तविक उपयोगिता और पाकिस्तान की प्रतिबद्धता की परीक्षा हो सकती है।
Must Read: बालाघाट में बच्चों की मौत से हड़कंप, आदिवासी गांवों में पहुंचे CJP के अभिजीत दीपके; उठाए सवाल
पाकिस्तान के सामने बड़ा रणनीतिक संतुलन
पाकिस्तान के लिए यह मुद्दा केवल सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं है। यमन संघर्ष में सीधे उतरने से उसके क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि इस्लामाबाद फिलहाल सऊदी अरब के साथ एकजुटता दिखाते हुए भी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचता नजर आ रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब की ओर से सैन्य सहायता की औपचारिक मांग होती है या नहीं और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान मक्का पैक्ट के तहत क्या कदम उठाता है।