चेन्नई | दक्षिण भारतीय सिनेमा के सबसे दमदार अभिनेताओं में शामिल विजय सेतुपति का सफर संघर्षों से भरा रहा है। ‘मक्कल सेल्वन’ (जनता का चहेता) के नाम से मशहूर इस अभिनेता ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में अपने बचपन की गरीबी और कड़े संघर्ष के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी फिल्मों में आने का सपना नहीं देखा था, बल्कि पैसों की भारी तंगी के कारण उन्हें दिहाड़ी मजदूरी, सेल्समैन और टेलीफोन बूथ ऑपरेटर तक का काम करना पड़ा।
‘मैंने कभी फिल्मों का सपना नहीं देखा’
विजय सेतुपति ने ट्रूली राम पॉडकास्ट में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा कि एक्टिंग का उनका कभी कोई प्लान ही नहीं था। उन्होंने कहा, “सर, मुझे कभी फिल्मों में आने की इच्छा नहीं थी। मुझे हमेशा काम करना पसंद था। स्कूल में पढ़ता था, तब दिहाड़ी वाले काम करता था। उसके बाद टेलीफोन बूथ पर भी काम किया।”
उन्होंने आगे बताया, “जिंदगी में मैंने कई दरवाजे खटखटाए हैं। रात की शिफ्टों में भी काम किया है। जब भी मुझे कुछ चाहिए होता था, मैं पहले सोचता था कि मुझे वाकई में उसकी कितनी जरूरत है। तब आपकी आर्थिक स्थिति ही तय करती है कि आपको कितना चाहना चाहिए।”
कर्ज वसूलने वालों और पिता की बुलेट बाइक की याद
विजय सेतुपति को केवल वे नौकरियां ही याद नहीं, जो उन्होंने मजबूरी में कीं, बल्कि वे दिन भी याद हैं जब कर्ज वसूलने वाले उनके घर आया करते थे। उन्होंने बताया कि उस मुश्किल दौर में वे हमेशा अपने पिता के साथ बैठते थे।
भावुक होते हुए उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं कि जवानी में गरीबी और संघर्ष होता है। मैंने तो बचपन से ही ये सब देखा है। मेरे लिए यही जिंदगी थी। जब भी कर्ज वसूलने वाले घर आते थे या कोई बैठकर बात करता था, तो मैं ही अपने पिता के साथ बैठता था। इन चीजों से मैं डील करता था।”
पिता की एक छोटी-सी आदत को याद करते हुए विजय सेतुपति की आंखें नम हो गईं। उन्होंने बताया, “मेरे पिता रोज रात करीब साढ़े नौ बजे घर आते थे। अपनी बुलेट बाइक खड़ी करते थे और हमारे लिए फ्राइड राइस लेकर आते, जिसे हम सब मिलकर खाते थे।” इस छोटी सी याद का वजन उनके लिए किसी भी अवॉर्ड से ज्यादा है।
छोटे-मोटे कामों से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर
1978 में तमिलनाडु के राजापालयम में जन्मे विजय सेतुपति बचपन में ही चेन्नई आ गए थे। उन्होंने पढ़ाई के दौरान रिटेल स्टोर में सेल्समैन, फास्ट फूड आउटलेट में कैशियर और टेलीफोन बूथ ऑपरेटर तक का काम किया। बाद में उन्होंने बीकॉम की पढ़ाई पूरी की और कॉलेज खत्म होते ही एक होलसेल सीमेंट बिजनेस में अकाउंट्स असिस्टेंट की नौकरी शुरू की। इसके बाद वे अकाउंटेंट के तौर पर दुबई भी गए।
भारत लौटने के बाद विजय ने थिएटर, शॉर्ट फिल्मों और छोटे किरदारों से अपने करियर की शुरुआत की। साल 2010 में आई तमिल फिल्म ‘थेनमेरकु परुवाकात्रु’ ने उन्हें बड़ा ब्रेक दिया। आज 48 साल के विजय सेतुपति इंडियन सिनेमा के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले अभिनेताओं में शामिल हैं और 50 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं।
हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज बने विजय
विजय सेतुपति को हमेशा उन फिल्मों के लिए जाना जाता है, जिनमें उन्होंने समाज के हाशिये पर खड़े लोगों का किरदार निभाया। ‘सूडू कव्वुम’ में किडनैपर से लेकर ‘सुपर डिलक्स’ में ट्रांसवुमन तक, उन्होंने इन किरदारों को कभी छोटा या कमजोर नहीं दिखाया। उनका यही अंदाज उन्हें आम लोगों का चहेता बनाता है और उनके संघर्ष की कहानी लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है।