मुंबई में जब मॉनसून अपनी पूरी रफ्तार में होता है, तो शहर की रफ्तार थम सी जाती है। लेकिन इसी मूसलाधार बारिश और लोकल स्टेशनों की भारी भीड़ के बीच, एक फिल्म चुपचाप सिनेमा के पर्दे पर दस्तक देती है- ‘बेबी डू डाई डू’।
फिल्म की शुरुआत ही आपको अपनी सीट से बांध देती है, जहां बारिश की बूंदें सड़कों पर शोर मचा रही हैं, लेकिन यह शोर जल्द ही एक अजीब सी घबराहट और सन्नाटे में बदल जाता है।
लाल छाता और खतरे की घंटी
एक लोकल रेलवे स्टेशन पर एक लाल रंग का छाता सबका ध्यान खींचता है। यह लाल रंग मानो किसी आने वाले खतरे की घंटी है। इस छाते को थामे हुए महिला के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं हैं, उसकी नजरें भीड़ में किसी बुजुर्ग को तलाश रही हैं।
वह बेहद शातिर तरीके से आगे बढ़ती है, अपने छाते को पोजीशन में लाती है और उसके हैंडल में छिपे ट्रिगर को दबा देती है। बिना किसी आवाज के एक गोली चलती है और खेल खत्म।
हुमा कुरैशी का खामोश धमाका
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी मुख्य किरदार ‘बेबी करमकर’ है, जिसका किरदार हुमा कुरैशी ने निभाया है। हुमा ने इस फिल्म में एक ऐसी कॉन्ट्रैक्ट किलर का किरदार निभाया है जो न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है।
बिना बात किए, सिर्फ अपनी सख्त और कातिलाना नजरों से खौफ पैदा करना एक बड़ा चैलेंज था, जिसमें हुमा पूरी तरह खरी उतरी हैं।
बदला लेने का सफर
हर कातिल के पीछे एक कहानी होती है, और बेबी की जिंदगी का अतीत भी बेहद दर्दनाक है। बचपन में अपनी जुड़वां बहन की हत्या का गहरा सदमा और फिर तंगहाली के बीच ऐसे लोगों के साथ बड़े होना, जो खुद जिंदगी से जंग लड़ रहे हैं, बेबी को जुर्म की राह पर ले जाता है।
अपनी मरी हुई बहन की पायल को ताबीज की तरह पहनकर घूमने वाली बेबी को घर के बाहर एक नया परिवार मिलता है।
खून के रिश्तों से बड़ा परिवार
चंकी पांडे का किरदार उसे एक पिता जैसा प्यार देता है, तो वहीं एक दोस्त, जो उसका सगा भाई नहीं है, लेकिन इस धंधे की बारीकियां सीख रहा है, उसके लिए भाई की कमी पूरी करता है।
खून के रिश्तों के बिना बने इस क्रिमिनल परिवार का ताना-बाना हालांकि पुराना फॉर्मूला है, लेकिन यहां इसे बिल्कुल नए और अछूते अंदाज में पेश किया गया है।
खूबसूरत प्रेम कहानी
इस गंदी, डार्क और उदास कर देने वाली क्राइम थ्रिलर का सबसे खूबसूरत हिस्सा बेबी और उससे बेपनाह मोहब्बत करने वाले लड़के की प्रेम कहानी है।
सिद्धू (रचित सिंह) नाम का यह लड़का बड़े-बड़े सपने लेकर मुंबई आया था, लेकिन अब वह चॉल के गरीब बच्चों को म्यूजिक सिखाकर ही अपनी जिंदगी में खुश है। वह बेबी की खामोशी जानने के बाद भी उससे बेइंतहा प्यार करता है।
रामू के सिनेमा की याद
बेबी का मुकाबला इस शहर के पुराने और खूंखार अंडरवर्ल्ड से होता है। कहानी में क्रूर बिल्डर्स, उनके बेरहम गुंडे, बिजनेस के दुश्मन, उनकी शातिर पत्नियां और रास्तों पर गश्त लगाते भ्रष्ट पुलिसवाले शामिल हैं।
ये सारे किरदार हमें राम गोपाल वर्मा की कल्ट गैंगस्टर फिल्मों (जैसे ‘सत्या’ या ‘कंपनी’) की याद दिलाते हैं।
बंधी-बंधाई इमेज से बाहर कलाकार
फिल्म की स्टारकास्ट को उनकी बंधी-बंधाई इमेज से बाहर निकालकर इस्तेमाल करना बेहद सुखद है। सीमा पाहवा को अक्सर घरेलू या कॉमेडी किरदारों में देखा गया है, लेकिन यहां वह शहर में गश्त करने वाली एक कड़क और अनुभवी पुलिस ऑफिसर के रूप में कमाल कर गई हैं।
वहीं सिकंदर खेर ने एक लालची शख्स के रोल में जान फूंक दी है, और चंकी पांडे का भलाई के मुखौटे के पीछे छिपा ग्रे शेड भी देखने लायक है।
मुंबई का बेरहम चेहरा
तकनीकी तौर पर फिल्म ने मुंबई के उस चेहरे को दिखाया है जो चकाचौंध से कोसों दूर है। कैमरा जब बार-बार पीछे जाता है, तो चॉल की तंग गलियों और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच पिसते आम लोगों का संघर्ष साफ नजर आता है।
अंधेरे के साए में होने वाले अपराधों और इस शहर की अंधी गलियों को दिखाने में मेकर्स ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।
कमियां भी हैं, लेकिन…
ऐसा नहीं है कि फिल्म पूरी तरह परफेक्ट है। कहानी के कुछ हिस्से थोड़े उलझे हुए और जबरदस्ती बुने हुए लगते हैं। क्लाइमेक्स में होने वाले जो बड़े खुलासे हैं, उन्हें लेकर सस्पेंस उतना गहरा नहीं रह पाता जितना मेकर्स ने उम्मीद की होगी।
लेकिन ये छोटी-मोटी कमियां फिल्म के ओवरऑल एंटरटेनमेंट और थ्रिल को कम नहीं करतीं।
कुल मिलाकर…
‘बेबी डू डाई डू’ सिर्फ एक इंसान के बदले की कहानी नहीं है, बल्कि इस फिल्म में ‘मुंबई’ शहर बेरहम और अहम किरदार की तरह उभरकर सामने आता है।
अगर आप तेज रफ्तार वाले कल्ट रिवेंज ड्रामा, बेहतरीन अदाकारी और एक अलग मिजाज का सिनेमा देखने के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपके वीकेंड के लिए एक परफेक्ट चॉइस है।