भारत में दान देना केवल एक सामाजिक कार्य नहीं है, बल्कि यह यहां की संस्कृति और संस्कारों का एक अभिन्न हिस्सा है. हाल ही में अशोका यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैंथ्रॉपी’ (CSIP) द्वारा जारी एक विस्तृत सर्वे रिपोर्ट ने भारत में दान देने के तरीकों और मानसिकता पर कई चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं. यह रिपोर्ट बताती है कि एक आम भारतीय अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा दूसरों की मदद के लिए निकालने में कभी पीछे नहीं रहता है. आइए जानें कि इससे धर्म के खाते में आखिर कितना जाता है.
दान देने की मजबूत भागीदारी
सर्वे के अनुसार, भारत में दान देने की परंपरा बहुत व्यापक है. रिपोर्ट में ऐसा सामने आया है कि 68% भारतीयों ने पिछले तीन महीनों की छोटी सी अवधि में किसी न किसी रूप में दान दिया है. इसमें केवल नकद पैसा ही शामिल नहीं है, बल्कि वस्तुओं के रूप में सहयोग और खुद का समय देकर की गई ‘स्वयंसेवा’ (Volunteering) भी शामिल है. भारत में यह ‘रोजमर्रा का दान’ एक बड़े आर्थिक स्रोत के रूप में उभर रहा है, जो देश की सामाजिक सुरक्षा में एक अदृश्य लेकिन मजबूत भूमिका निभाता है.
धार्मिक संस्थाओं को मिलता है सबसे ज्यादा चंदा
भारतीयों के दान देने के व्यवहार में एक खास बात यह है कि उनका सबसे अधिक झुकाव धार्मिक संस्थाओं की ओर रहता है. आंकड़े बताते हैं कि-
धार्मिक प्राथमिकता: व्यक्तिगत दान का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या अन्य धार्मिक स्थलों को जाता है. करीब 46 फीसदी हिस्सा धर्म के खाते में जाता है.
NGO को कम हिस्सा: इसकी तुलना में गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करने वाले संस्थानों (SPO) को बहुत ही कम 15 फीसदी हिस्सा मिल पाता है.
बढ़ता ग्राफ: साल 2019 में भारत में ‘रिटेल गिविंग’ (आम जनता द्वारा दिया गया दान) का अनुमान लगभग 34,000 करोड़ रुपये था. साल 2023 तक यह आंकड़ा बढ़कर 37,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.
औपचारिक और अनौपचारिक माध्यम
भारत में दान का एक बड़ा हिस्सा आज भी ‘अनौपचारिक’ है, यानी वह सीधे हाथों-हाथ या गुप्त दान के रूप में दिया जाता है. इसे किसी सरकारी रिकॉर्ड या बैंक ट्रांजेक्शन के जरिए ट्रैक करना मुश्किल होता है.
कम पारदर्शिता: 2019 में कुल दान का केवल 10% हिस्सा ही औपचारिक चैनलों (बैंक, रसीद, ऑनलाइन) के जरिए दिया गया था.
सुधार की स्थिति: 2023 में इसमें सुधार हुआ और लगभग 22% दान औपचारिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया गया.
इसका सीधा अर्थ यह है कि आज भी लगभग 78% दान सीधे नकद या स्थानीय स्तर पर बिना किसी दस्तावेजी रिकॉर्ड के दिया जा रहा है.
दान देने के प्रमुख तरीके
भारत में लोग केवल पैसा देकर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं समझते हैं. रिपोर्ट ने दान को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है:
वस्तु के रूप में दान (45.6%): यह भारत में सबसे लोकप्रिय तरीका है. लोग पुराने कपड़े, अनाज, दवाइयां या अन्य जरूरत का सामान सीधे जरूरतमंदों या धार्मिक केंद्रों को देना पसंद करते हैं.
स्वयंसेवा (44.9%): करीब आधे लोग अपना कीमती समय निकालकर दूसरों की सेवा में लगाते हैं. यह सामुदायिक कार्यों या लंगर जैसी सेवाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.
नकद दान (30.8%): नकद राशि देने वालों का प्रतिशत अन्य दो श्रेणियों की तुलना में कम है. छोटे नकद दान आमतौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बजाय सीधे हाथों में या दानपात्रों में दिए जाते हैं.
गरीब भी हैं दिलदार
अकसर यह माना जाता है कि केवल अमीर लोग ही दान देते हैं, लेकिन रिपोर्ट के तथ्य इस धारणा को तोड़ते हैं. दान का सीधा संबंध परिवार की मासिक खपत (Consumption) से जुड़ा है. जिन परिवारों का मासिक खर्च मात्र 4,000 से 5,000 रुपये के बीच है, उनमें से भी लगभग 50% परिवार नियमित रूप से दान देते हैं.
जैसे ही किसी परिवार का मासिक खर्च 8,000 रुपये से ऊपर जाता है, उनके दान देने की संभावना और अधिक बढ़ जाती है. यह दर्शाता है कि भारत में दान देने की भावना आर्थिक स्थिति से ज्यादा ‘इच्छाशक्ति’ पर निर्भर करती है.
विकसित देशों के मुकाबले भारत की स्थिति
रिपोर्ट में भारत के दान मॉडल की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों से भी की गई है. वहां दान की प्रक्रिया पूरी तरह ‘सिस्टम’ से जुड़ी होती है. अमेरिका में साल 2022 के दौरान करदाताओं ने लगभग 257.6 अरब डॉलर के चैरिटेबल दान का दावा किया. वहीं ब्रिटेन में ‘गिफ्ट एड’ (Gift Aid) के जरिए सरकार ने चैरिटी संस्थाओं को 1.6 अरब पाउंड दिए.
विकसित देशों में दानदाता NGO की रीढ़ माने जाते हैं, क्योंकि वहां पैसा सीधे सिस्टम के जरिए सामाजिक कार्यों में खर्च होता है. भारत में अनौपचारिक दान ज्यादा होने के कारण NGO को बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फंड जुटाने और पारदर्शिता बनाए रखने में संघर्ष करना पड़ता है.