मध्य प्रदेश के सीहोर (Sehore) जिले से एक ऐतिहासिक और अनोखा मामला सामने आया है। यहां के एक प्रतिष्ठित कारोबारी परिवार ने दावा किया है कि प्रथम विश्व युद्ध (First World War) के दौरान उनके दादा ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का ‘वॉर लोन’ (War Loan) दिया था, जो 109 साल बाद भी नहीं चुकाया गया। अब परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य ने यह रकम ब्याज समेत वसूलने की ठानी है।
कौन हैं दावेदार और क्या है पूरा मामला?
65 वर्षीय व्यवसायी विवेक रुथिया (Vivek Ruthia) ने बताया कि उनके दादा सेठ जुम्मा लाल रुथिया (Seth Jumma Lal Ruthia) ने 4 जून 1917 को यह राशि दी थी। उस समय ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध के लिए धन जुटाने हेतु ‘इंडियन वॉर लोन’ (Indian War Loan) की योजना शुरू की थी, जिसके तहत देशी रियासतों और धनी व्यापारियों से योगदान लिया गया था।
परिवार के पास है 1917 का प्रमाण पत्र
विवेक रुथिया के पास इस दावे को पुष्ट करने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। उनके अनुसार, उनके पास 4 जून 1917 का वह मूल प्रमाण पत्र (Certificate) है, जिस पर तत्कालीन ‘पॉलिटिकल एजेंट इन भोपाल’ (Political Agent in Bhopal) के हस्ताक्षर हैं। इस प्रमाण पत्र में स्पष्ट लिखा है कि सेठ जुम्मा लाल ने 35 हज़ार रुपये की सदस्यता ली और साम्राज्य के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई।
अब करोड़ों की हो गई है रकम
परिवार का कहना है कि उनके दादा का 1937 में निधन हो गया था, लेकिन उन्होंने अपनी वसीयत (Will) में इस ऋण और उससे जुड़े पत्राचार का जिक्र किया था। विवेक रुथिया का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) के तहत एक संप्रभु राष्ट्र पर अपने पुराने ऋण चुकाने की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। उनका दावा है कि 109 वर्षों के ब्याज को जोड़ दिया जाए तो यह राशि अब करोड़ों रुपए (Crores of Rupees) में पहुंच गई है।
आगे की योजना: ब्रिटेन सरकार को कानूनी नोटिस
विवेक रुथिया ने बताया कि वे अपने वकील से सलाह-मशविरा कर यूनाइटेड किंगडम (UK Government) की सरकार को जल्द ही एक औपचारिक कानूनी नोटिस (Legal Notice) भेजेंगे। उनका कहना है कि भारत के आजाद होने के बाद भी यह ऋण अदा नहीं किया गया, जो कि अन्यायपूर्ण है।
सीहोर में रुथिया परिवार की पुरानी पहचान
बता दें कि स्वतंत्रता से पहले रुथिया परिवार (Ruthia Family) की सीहोर और आसपास के इलाकों में काफी मान्यता थी। यह परिवार उस समय के सबसे संपन्न कारोबारी परिवारों में गिना जाता था। आज भी सीहोर शहर का एक बड़ा हिस्सा परिवार के नाम पर बसा हुआ है।