भारतीय राजनीतिक इतिहास में 4 नवंबर 1977 का दिन एक असाधारण घटना के लिए याद किया जाता है। उस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई एक विमान हादसे में चमत्कारिक रूप से बच गए थे। असम के जोरहाट के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, लेकिन वे मामूली चोटों के साथ कीचड़ भरे धान के खेत में पैदल बाहर निकल आए।
कैसे हुआ हादसा?
मोरारजी देसाई पूर्वोत्तर भारत के दौरे पर थे। वे सोवियत निर्मित टुपोलेव TU-124 विमान (पुष्पक) से जोरहाट एयरपोर्ट पर उतरने वाले थे। मौसम की परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। पहली लैंडिंग कोशिश असफल रही। दूसरी कोशिश के दौरान विमान रनवे को पार कर गया और नियंत्रण खो बैठा।
रात के अंधेरे में विमान पेड़ों से टकराया और जोरहाट से लगभग 23 किलोमीटर दूर टेटलगांव के पास एक धान के खेत में क्रैश-लैंडिंग कर गया। विमान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन उसका पिछला हिस्सा अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा।
कैसे बची जान?
हादसे के समय विमान में 25 लोग सवार थे। इनमें से 20 लोग जीवित बच गए, जबकि पांच वायुसेना कर्मियों की मौत हो गई। बताया जाता है कि खेत की नरम मिट्टी और फसल ने टक्कर के असर को कुछ हद तक कम कर दिया।
हादसे के बाद विमान का पिछला दरवाजा खोला गया और मोरारजी देसाई खुद बाहर निकले। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वे शांत और संयमित थे। उन्होंने घबराहट के बजाय दूसरों को संभालने की कोशिश की। कीचड़ भरे खेत में चलते हुए उनका बाहर आना किसी चमत्कार से कम नहीं माना गया।
हादसे के बाद
स्थानीय ग्रामीणों और प्रशासन ने तुरंत राहत कार्य शुरू किया। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। बाद में इस हादसे को भारतीय विमानन इतिहास की बड़ी घटनाओं में गिना गया।
मोरारजी देसाई का यह बचाव उनके धैर्य और साहस की मिसाल के रूप में अक्सर याद किया जाता है। यह घटना आज भी राजनीतिक और ऐतिहासिक चर्चाओं में एक प्रेरक प्रसंग के रूप में सामने आती है।