पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव और ईरान-इजराइल (Iran-Israel) के बीच जारी युद्ध का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर पड़ने लगा है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत के पास अब केवल 25 दिनों का कच्चा तेल (Crude Oil) और रिफाइंड उत्पादों का स्टॉक बचा है। इसकी सबसे बड़ी वजह स्ट्रैट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) का बंद होना है, जिसे दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माना जाता है। ईरान ने इस मार्ग से किसी भी जहाज के गुजरने पर आग लगाने की चेतावनी दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है।
भारत पर कितना बड़ा असर?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता (third-largest consumer) है और अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात (85% crude oil import) करता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। होर्मुज मार्ग बंद होने का सबसे ज्यादा असर भारत समेत एशियाई देशों पर ही पड़ेगा।
वैश्विक बाजार में उछले तेल के दाम
इस भू-राजनीतिक संकट के चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ गया है।
- ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें करीब 5.58% बढ़कर 80.41 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव जारी रहा, तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर सकती हैं।
पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे? राहत की बात
आम जनता के लिए राहत की खबर यह है कि सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल (Petrol-Diesel) के दाम बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय (Petroleum Ministry) ने साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर कीमतों को स्थिर रखने की पूरी कोशिश की जाएगी। हाल ही में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri) ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा की है।
सरकार ने कसी कमर, वैकल्पिक रास्तों पर फोकस
तेल आपूर्ति के इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं:
- रूस से तेल खरीद बढ़ाने की तैयारी: भारत एक बार फिर रूस (Russia) से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने जा रहा है। रूस से सस्ता तेल मिलना भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
- समुद्र में खड़े टैंकर खरीदने का प्लान: रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत उन रूसी तेल टैंकरों (Russian oil tankers) को खरीदने पर विचार कर रहा है, जो फिलहाल भारतीय तटों के आसपास एशियाई जल क्षेत्र में खड़े हैं। करीब 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल इन टैंकरों में मौजूद है। इससे तुरंत सप्लाई मिल सकेगी और परिवहन लागत भी कम होगी।
- अन्य वैकल्पिक देश: सरकार अफ्रीकी देशों और अन्य स्रोतों से तेल आयात के विकल्प भी तलाश रही है, ताकि पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम की जा सके।
व्यापार पर भी पड़ेगा असर
इस संकट का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। वाणिज्य मंत्रालय (Commerce Ministry) ने भी एक बैठक बुलाकर निर्यात-आयात (Export-Import) पर पड़ने वाले असर की समीक्षा की है।
- शिपिंग रूट बदलने से बढ़ी लागत: तनाव के कारण जहाजों के रूट बदलने पड़ रहे हैं, जिससे ट्रांजिट टाइम (Transit Time) बढ़ गया है और माल ढुलाई (Freight Cost) व बीमा (Insurance Cost) की लागत में भी इजाफा हुआ है।
- एक्सपोर्टर्स के लिए राहत के उपाय: सरकार ने निर्यातकों और आयातकों के लिए दस्तावेजीकरण और भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया है।