पंचायतों पर बढ़ता 'ठेकेदार राज'! राजनीतिक दबाव में छीने जा रहे सरपंचों के अधिकार?
15वें वित्त आयोग के निर्माण कार्यों में कथित हस्तक्षेप और अनियमितताओं की चर्चाओं के बीच पंचायतों की स्वायत्तता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल
अमरवाड़ा (छिन्दवाड़ा)। पंचायत राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य ग्राम पंचायतों को स्थानीय विकास कार्यों में आत्मनिर्भर, जवाबदेह और सशक्त बनाना है। लेकिन अमरवाड़ा जनपद पंचायत क्षेत्र में 15वें वित्त आयोग से स्वीकृत निर्माण कार्यों को लेकर सामने आ रही चर्चाओं ने पंचायतों की वास्तविक भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियों और सूत्रों के अनुसार, सड़क, सीसी रोड तथा अन्य निर्माण कार्यों में कुछ ग्राम पंचायतों के सरपंचों पर कथित रूप से राजनीतिक अथवा अन्य प्रकार का दबाव बनाया जा रहा है कि वे निर्माण कार्य स्वयं कराने के बजाय बाहरी व्यक्तियों या ठेकेदारों के माध्यम से कराएं। बताया जाता है कि पंचायतों से प्रस्ताव पारित कराकर तकनीकी स्वीकृति (टीएस) प्राप्त की जाती है, लेकिन इसके बाद निर्माण कार्यों का संचालन पंचायत के बजाय अन्य लोगों के हाथों में चला जाता है। यदि ऐसा हो रहा है, तो पंचायतें केवल कागज़ों में निर्माण एजेंसी बनकर रह जाती हैं।
सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ मामलों में निर्माण कार्यों से पहले कथित रूप से कमीशन और अन्य व्यवस्थाओं पर राशि खर्च होने की चर्चा है। यदि इन दावों में सत्यता है, तो इससे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता और सरकारी धन के उद्देश्य पर भी प्रश्न उठते हैं।
पंचायत चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं। ऐसे में कई जनप्रतिनिधि दबाव, विवाद अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं। परिणामस्वरूप वे अपने वैधानिक अधिकारों का प्रभावी उपयोग करने के बजाय सीमित भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह पंचायत राज व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत माना जा सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि निर्माण कार्यों का वास्तविक संचालन पंचायतों के बजाय अन्य लोगों द्वारा किया जा रहा है, तो ग्राम पंचायतों को निर्माण एजेंसी बनाए जाने का उद्देश्य क्या रह जाता है? साथ ही यह भी आवश्यक है कि संबंधित विभाग पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा कर यह स्पष्ट करे कि निर्माण कार्य वास्तव में पंचायतों द्वारा कराए जा रहे हैं या केवल दस्तावेजों में पंचायतों का नाम उपयोग हो रहा है।
जनहित में उठते सवाल
* क्या ग्राम पंचायतों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप स्वतंत्र रूप से कार्य करने दिया जा रहा है?
* क्या 15वें वित्त आयोग के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होगी?
* क्या तकनीकी स्वीकृति (टीएस) से लेकर कार्य पूर्ण होने तक की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा?
* यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है, तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
* क्या संबंधित विभाग पंचायतों की वास्तविक भूमिका और कार्य निष्पादन की निष्पक्ष जांच करेगा?
यदि इन प्रश्नों की समय रहते पारदर्शी एवं निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो पंचायत राज व्यवस्था की मूल भावना कमजोर हो सकती है और ग्रामीण विकास कार्यों की पारदर्शिता पर जनता का विश्वास भी प्रभावित हो सकता है।