जब से फिल्म ‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’ का ऐलान हुआ है, ही-मैन के फैंस में अलग ही उत्साह है। 80 के दशक के फेवरेट खिलौने और कॉमिक बुक को हम सभी ने खूब पसंद किया है।
वह 1987 का साल था जब पिछली बार ‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’ फिल्म बनाई गई थी। उस जमाने में यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई थी। अब निकोलस गैलिट्ज़िन स्टारर नई फिल्म से चाहने वालों को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन क्या यह उन सभी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई?
कहानी क्या है?
‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’ की शुरुआत इटर्निया के राजकुमार एडम की ट्रेनिंग से होती है। 10 साल का एडम योद्धा बनने की ट्रेनिंग ले रहा है, लेकिन हर बार फेल हो जाता है। उसका हैंड टू आई कोऑर्डिनेशन अच्छा नहीं है, जिससे वह रोज धोबी-पछाड़ खाता है।
इटर्निया पर खतरनाक विलेन स्केलेटर हमला करता है, जिसके चलते एडम को शक्ति की तलवार देकर भगा दिया जाता है। 15 साल बाद एडम पृथ्वी पर रहता है और एक कंपनी के ह्यूमन रिसोर्सेज डिपार्टमेंट में काम करता है। उसका काम है लोगों की बातें सुनना और उनके मसले सुलझाना।
एडम की तलवार ही है उसका रास्ता
एडम अब भी अपने घर और वहां के लोगों को याद करता है और वापस जाना चाहता है। दिक्कत यह है कि घर से भागने के बाद उसने अपनी जादुई तलवार खो दी थी। वह तलवार ही उसे घर वापस ले जाएगी।
एडम के लिए लौटना भले ही मुश्किल हो, लेकिन वहां जाकर अपने माता-पिता और लोगों को बचाना और स्केलेटर का सामना करना उसकी सोच से भी ज्यादा खतरनाक है। यही फिल्म की मुख्य कहानी है।
कैसी है फिल्म?
यह फिल्म बहुत ही 50-50 मूवी है। डायरेक्टर ट्रेविस नाइट ने इसके फील को जिंदा रखने की पूरी कोशिश की है। 80 के दशक की कहानी में आपको नॉस्टेल्जिया महसूस करने की भरपूर कोशिश की गई है।
एडम का अंदाज भी उसी समय के हिसाब का है। वह लोगों को अपनी दुनिया की कहानियां सुनाता है और लोग उसे पागल समझते हैं। निकोलस गैलिट्ज़िन का गूफी अंदाज एडम और फिर ही-मैन के किरदार को बढ़िया बनाता है। उनका मस्कुलर अवतार भी देखने लायक है।
जारेड लेटो का विलेन अवतार
विलेन स्केलेटर के रोल में जारेड लेटो मजेदार हैं। वह इस खूंखार रोल से आपको डराते भी हैं और हंसाते भी। स्केलेटर के एडम और उसकी बॉडी पर किए गए तंज काफी फनी हैं।
एक सीन जो मुझे पसंद आया वह था, एडम का स्केलेटर से कहना कि ‘फेस टू फेस’ बात कर लेते हैं। लेकिन स्केलेटर तो कंकाल के मुंह वाला है, उसका तो कोई चेहरा ही नहीं है। ऐसे में स्केलेटर कहता है- पहली बात तो मेरा फेस नहीं है और दूसरा, मेरा मन नहीं है।
मर्दानगी की थीम पर बनी है फिल्म
यह फिल्म मर्दानगी की थीम पर बनी है। यहां हमारा हीरो अपने डेस्क पर अपने प्रोनाउन ‘ही/हिम’ फ्लॉन्ट करता है। वह बात करने के महत्व को समझता है और अपनी फीलिंग्स के बारे में खुलकर बात करता है।
वह अपने बचपन के हीरोज रैम मैन, फिस्टो, मेकानेक को जंग से पहले सेमिनार देता है। लेकिन अंत में उसकी दी हुई बड़ी सीखें आप भूल जाते हैं, क्योंकि उनमें कुछ नया या दमदार नहीं है।
कहां रह गई कमी?
जब आप किसी सुपरहीरो मूवी के बारे में सोचते हैं तो चाहते हैं कि उसमें धुआंधार एक्शन भी नजर आए। ‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’ में यह कम ही होता है। इसकी कहानी बहुत अच्छे से एक्सप्लोर की गई नहीं लगती।
चौंकाने वाली बात यह है कि इसे एक नहीं बल्कि चार राइटर्स ने लिखा है। चार राइटर्स होने के बावजूद कहानी इतनी कमजोर है, यह निराशाजनक है।
फिल्म की रफ्तार नहीं ठीक
पिक्चर की रफ्तार कभी बढ़ती तो कभी घटती है, लेकिन इसके साथ आपका मजा बना रहना मुमकिन नहीं होता। फिल्म में कई ऐसे पल हैं जहां आपको लगेगा कि अब एक्शन शुरू होगा, लेकिन ऐसा नहीं होता।
एडम और उसकी दोस्त टीला के बीच न के बराबर रोमांस और केमिस्ट्री है। एक सुपरहीरो फिल्म में रोमांस का होना जरूरी नहीं है, लेकिन जब वह हो तो उसमें दम होना चाहिए।
कैमिला मेंडेस और इद्रिस एल्बा का रोल
कैमिला मेंडेस के अलावा इद्रिस एल्बा का किरदार भी ज्यादा कुछ खास नहीं है। वह एक बड़े स्टार हैं, लेकिन उनके किरदार को पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है।
एलिसन ब्री ठीक हैं, लेकिन वह भी कोई कमाल नहीं कर पातीं। बड़े कलाकारों के होने के बावजूद फिल्म प्रभावित नहीं करती।
और भी फिल्मों की आती है याद
‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’ देखते हुए आपको और भी बहुत-सी फिल्मों की याद आती है। इसमें ह्यूमर का इस्तेमाल खूब किया गया है, लेकिन हमेशा जोक्स पर हंसी नहीं आती।
एक्शन जोरदार नहीं लगता और फिल्म असरदार नहीं रहती। पुरानी यादों को ताजा करने के लिए फिल्म आपको थ्रिल जरूर देती है, लेकिन वह थ्रिल आप सच में चाहते हैं या नहीं, इसके बारे में सोचना पड़ेगा।
पुरानी यादें ताजा करने के लिए ठीक है
अगर आप 80 के दशक के ही-मैन के फैन हैं, तो आपको यह फिल्म पुरानी यादें ताजा करने के लिए ठीक लग सकती है। लेकिन अगर आप एक दमदार सुपरहीरो फिल्म की तलाश में हैं, तो यह आपको निराश करेगी।
फिल्म में वह धमाका नहीं है जो एक सुपरहीरो फिल्म में होना चाहिए। कमजोर कहानी और औसत दर्जे के एक्शन ने फिल्म को बीच की श्रेणी में रख दिया है।
कुल मिलाकर क्या राय है?
मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स एक ऐसी फिल्म है जो न तो पूरी तरह बेकार है और न ही शानदार। यह आपको कुछ पलों में हंसाती है और पुराने दिनों की याद दिलाती है, लेकिन जब तक आप थिएटर से बाहर निकलते हैं, आप फिल्म का असर खो चुके होते हैं।
अगर आपके पास समय है और आप ही-मैन के फैन हैं, तो एक बार देख सकते हैं। लेकिन उम्मीदें लेकर मत जाइएगा। यह फिल्म 2.5 स्टार की हकदार है। न तो ज्यादा अच्छी, न बहुत बुरी।