पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी ताश के पत्ते की तरह बिखरती जा रही है। एक-एक कर टीएमसी के विधायक और सांसद सियासी पाला बदलते जा रहे हैं।
ममता बनर्जी के तमाम मजबूत सिपहसलार और बड़े सितारे भी बगावत की राह पर चल पड़े हैं। 15 साल तक बंगाल में एकछत्र राज करने के बाद सत्ता हाथ से निकलते ही टीएमसी में असंतोष फूट पड़ा है।
सयानी घोष से शत्रुघ्न सिन्हा तक सब बागी
अब हालत यह हो गई है कि सयानी घोष से लेकर युसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बड़े सितारे भी बागी खेमे के साथ खड़े हो गए हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें ममता बनर्जी ने अपना करीबी माना जाता था।
टीएमसी में तमाम बड़े सिपहसलार अलग राह पर चल पड़े हैं, जिससे ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी निकलती जा रही है। यह ममता के लिए सबसे बड़ा झटका है।
19 बागी सांसदों ने बनाया अलग गुट
टीएमसी के 19 बागी सांसदों के नाम सामने आ गए हैं, जिन्होंने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग गुट बनाने का फैसला किया है। इस फेहरिश्त में उन सभी नेताओं के नाम हैं, जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है।
काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले इस बागी गुट में शत्रुघ्न सिन्हा, जगदीश चंद्र बसुनिया, खलीउर रहमान, यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान, पार्थ मौमिक, बापी हलधर, सायोनी घोष, माला रॉय, मिताली बाग, दीपक अधिकारी, कालीपद सोरेन, जून मालिया, अरूप चक्रवर्ती, शर्मिला सरकार, असित कुमार मल्ल, शताब्दी रॉय और रचना बनर्जी शामिल हैं।
ममता के साथ सिर्फ 9 लोकसभा सांसद बचे
2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी ने राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में 29 पर जीत हासिल की थी। बीजेपी को 12 और कांग्रेस को एक सीट मिली थी।
चुनावों के बाद टीएमसी के बशीरहाट से सांसद हाजी नुरुल इस्लाम की मौत हो गई थी। अब टीएमसी के पास 28 लोकसभा सांसद हैं, जिसमें से 19 सांसद बागी हो गए हैं। इसके बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 9 लोकसभा सांसद ही बचे हैं।
ममता के साथ बचे ये हैं सांसद
ममता बनर्जी के पास बचे टीएमसी लोकसभा सांसदों में फिलहाल कीर्ति आजाद, अभिषेक बनर्जी, सौगात राय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मोंडल, सुदीप बंधोपाध्याय, महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी और सजदा अहमद शामिल हैं।
ये कुछ ही नाम हैं जो अभी भी ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं। बाकी लगभग सभी बड़े नेता बागी हो चुके हैं।
राज्यसभा में भी टीएमसी को झटका
टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसद हैं, जिसमें से दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है। सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव ने राज्यसभा सदस्यता के साथ-साथ टीएमसी से भी इस्तीफा दे दिया है।
इन दोनों के अब बीजेपी से राज्यसभा जाने की चर्चा है। इस तरह 11 राज्यसभा सांसद बच रहे हैं, लेकिन उनमें से भी कितने सांसद ममता के साथ रहेंगे, यह कहना मुश्किल है।
विधानसभा में भी खूंखार बगावत
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के टिकट पर 80 विधायक जीतकर आए थे। इनमें से ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को ममता बनर्जी ने बाहर कर दिया था।
इसके बाद टीएमसी के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया। टीएमसी के कुछ अन्य विधायकों ने भी साथ छोड़ दिया है।
65 विधायक अब ममता से अलग
ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि अब उनके पास 64 विधायकों का समर्थन है और एक विधायक के उनके साथ जुड़ने के बाद यह संख्या 65 हो जाएगी।
इस तरह 80 में से 65 विधायक अब ममता बनर्जी से अलग होकर अपना अलग गुट बना चुके हैं और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मान चुके हैं।
ममता के साथ सिर्फ 15 विधायक बचे
टीएमसी के 65 विधायकों के बागी होने के बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 15 विधायक ही बच रहे हैं। यह संख्या बेहद कम है।
इससे पहले कभी ममता बनर्जी की पार्टी इतनी कमजोर नहीं हुई थी। विधानसभा में उनकी मौजूदगी अब ना के बराबर रह गई है।
बड़े शहरों के मेयर ने भी दिए इस्तीफे
बंगाल के तमाम बड़े शहरों के मेयर ने अपना इस्तीफा दे दिया है। इससे टीएमसी को शहरी क्षेत्रों में भी बड़ा झटका लगा है।
नगर निगमों में टीएमसी की पकड़ कमजोर हुई है। शहरी वोटर अब टीएमसी से नाराज दिख रहे हैं।
कैसे बिखरी ममता की पार्टी?
ममता बनर्जी ने एक जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। इसके बाद 13 साल तक संघर्ष कर उन्होंने साढ़े तीन दशक से सत्ता पर काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेंका था।
ममता के इस सियासी संघर्ष के रहे तमाम टीएमसी नेता अब धीरे-धीरे साथ छोड़ गए हैं। अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी ने कई नए चेहरों को सियासत में लाकर पहचान दी, लेकिन सत्ता बदलते ही उनका मोहभंग हो गया।
अब ममता के पास कितनी ताकत बची?
अब ममता बनर्जी के पास 9 लोकसभा सांसद, 11 राज्यसभा सांसद (जिनमें से कुछ और भी जा सकते हैं) और सिर्फ 15 विधायक बचे हैं। यह संख्या पहले के मुकाबले बहुत कम है।
बंगाल में टीएमसी का कुनबा तेजी से बिखर रहा है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी इस संकट से कैसे उबरती हैं और क्या वह दोबारा अपनी पार्टी को खड़ा कर पाती हैं।