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जंतर-मंतर प्रोटेस्ट केस में अलका लांबा दोषी, ‘नेकचलनी’ की शर्त पर कोर्ट ने दी रिहाई

By TEAM SMW NEWS Last updated: 06/06/2026 7 Min Read
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पिछले साल नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के मामले में महिला कांग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा को राउज एवेन्यू कोर्ट से राहत मिली है। हालांकि अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया है, लेकिन सजा सुनाने के बजाय एक साल तक अच्छे व्यवहार यानी नेकचलनी की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया है।

Contents
क्या था पूरा मामला?किन धाराओं में लगे थे आरोप?कोर्ट में क्या दलील दी?कोर्ट ने क्या कहा?एक लाख का बॉन्ड भरना होगाइससे पहले भी हुई थी सुनवाईमुकदमा लड़ने की जताई थी इच्छारिवीजन याचिका भी की थी खारिजप्रदर्शन में क्या थी मांग?नेकचलनी का क्या मतलब है?अलका लांबा की प्रतिक्रिया

उन्हें एक लाख रुपये का जमानती बॉन्ड भरने का भी निर्देश दिया गया है। अगर एक साल के भीतर वह किसी और कानूनी अपराध में संलिप्त पाई जाती हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला जुलाई 2024 में जंतर-मंतर पर आयोजित उस प्रदर्शन से जुड़ा है, जिसका नेतृत्व स्वयं अलका लांबा ने किया था। महिला कांग्रेस ने उस दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था।

पुलिस के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान निषेधाज्ञा का उल्लंघन हुआ, सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी करने से रोका गया और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। यही वजह रही कि पुलिस ने मामला दर्ज किया।

किन धाराओं में लगे थे आरोप?

राउज एवेन्यू कोर्ट ने इससे पहले 25 मई को अलका लांबा को दोषी ठहराया था। उन पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे।

अदालत ने उन्हें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 132, 221, 223(a) और 285 के तहत दोषी माना था। इन धाराओं में सरकारी कर्मचारियों के साथ धक्का-मुक्की करना, सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाना, कानूनी आदेशों की अवहेलना करना और सार्वजनिक रास्ता रोकना शामिल है।

कोर्ट में क्या दलील दी?

दोषी ठहराए जाने के बाद अलका लांबा ने अदालत से प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 4 के तहत राहत की मांग की थी। उन्होंने अनुरोध किया था कि उन्हें अच्छे व्यवहार के आधार पर रिहा किया जाए।

उनकी ओर से अधिवक्ता एम. जेड. खान और इमरान अली ने अदालत में पक्ष रखा। इसके बाद ACJM अश्विनी पंवार ने अभियोजन पक्ष को जवाब दाखिल करने का समय दिया था।

कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले को 6 जून के लिए सूचीबद्ध किया गया था। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने अलका लांबा की अर्जी स्वीकार कर ली।

कोर्ट ने माना कि दोष सिद्ध होने के बावजूद उन्हें एक अवसर दिया जा सकता है। इसी आधार पर उन्हें एक वर्ष तक नेकचलनी बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया। कोर्ट ने कहा कि इस अवधि में कानून उल्लंघन की स्थिति में उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

एक लाख का बॉन्ड भरना होगा

अदालत ने अलका लांबा को एक लाख रुपये का जमानती बॉन्ड भरने का निर्देश दिया है। यह बॉन्ड इस बात की गारंटी के तौर पर होगा कि वह अगले एक साल तक किसी भी तरह का कानूनी अपराध नहीं करेंगी।

अगर वह इस शर्त का उल्लंघन करती हैं, तो उनका बॉन्ड जब्त किया जा सकता है और उनके खिलाफ नए सिरे से कार्रवाई शुरू हो सकती है।

इससे पहले भी हुई थी सुनवाई

18 अप्रैल को कोर्ट ने दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज चार्जशीट के आधार पर अलका लांबा का बयान दर्ज किया था। इससे पहले अदालत उनके खिलाफ आरोप तय कर चुकी थी।

अदालत ने चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद उन्हें समन भी जारी किया था। 14 जनवरी को अदालत ने उनके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए थे। उस समय अलका ने आरोपों से इनकार किया था।

मुकदमा लड़ने की जताई थी इच्छा

अलका लांबा ने आरोप तय किए जाने के बाद मुकदमे का सामना करने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कोर्ट में कहा था कि वह निर्दोष हैं और आरोपों को गलत साबित करेंगी।

हालांकि, बाद में उन्होंने प्रोबेशन की अर्जी दाखिल कर दी। यही अर्जी अदालत ने स्वीकार कर ली और उन्हें रिहा कर दिया।

रिवीजन याचिका भी की थी खारिज

अलका लांबा ने आरोप तय किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने कोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की थी।

लेकिन 6 फरवरी को स्पेशल जज दिग विनय सिंह ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला आगे बढ़ा और अंततः 6 जून को फैसला आया।

प्रदर्शन में क्या थी मांग?

महिला कांग्रेस ने जुलाई 2024 में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। उनकी मुख्य मांग महिला आरक्षण कानून को तुरंत लागू करने की थी।

संसद ने महिला आरक्षण विधेयक तो पास कर दिया था, लेकिन इसके लागू होने में देरी हो रही थी। महिला कांग्रेस चाहती थी कि सरकार जल्द से जल्द इस कानून को लागू करे, ताकि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।

नेकचलनी का क्या मतलब है?

नेकचलनी यानी अच्छे व्यवहार की शर्त। इसका मतलब है कि अदालत ने अलका लांबा को इस शर्त पर रिहा किया है कि वह अगले एक साल तक कानून का पालन करेंगी और किसी भी तरह के अपराध में शामिल नहीं होंगी।

यह प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत दी जाने वाली एक राहत है। अदालत का मानना है कि पहली बार अपराध करने वाले व्यक्ति को सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए, बजाय सीधे जेल भेजने के।

अलका लांबा की प्रतिक्रिया

फैसले के बाद अलका लांबा ने क्या प्रतिक्रिया दी, इसकी तत्काल कोई जानकारी नहीं है। लेकिन उनके समर्थकों और पार्टी के नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है।

कांग्रेस पार्टी का कहना है कि अलका लांबा ने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी और उनके इरादे साफ थे। अदालत ने भी उन्हें अच्छे व्यवहार पर रिहा कर दिया है।

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